Thursday, March 29, 2018


मनीऑर्डर
मैंने पुस्तकें उठाई और एक बार फिर अपना चेहरा आईने में निहारा तो खुद-ब- खुद मुस्कुरा उठी। हूँ सुंदर दिख रही हो आईने  ने कहा – मैं कॉलेज जाने के लिए बाहर निकली तो काकी की आवाज़ सुनाई दी,  यह कोई आज की बात नहीं थी रोज ही का सिलसिला था –
काकी ने हाथ से रोकते हुए कहा – देख गुडिया तू लडकों के कॉलेज में पढती है, ज़रा खयाल रखा कर,  सावधान रह,  किसी से अधिक दोस्ती मत  करना,  अरे दुपट्टा तो ठीक से ओढ .... आदि आदि 
ऐसी हिदायतें  काकी रोज ही देती । सभी बडे-बूढों की भाँति काकी भी हिदायत देती,  यह मुझे सहज ही लगता था , इसी कारण मैं कभी सुनी-अ‍नसुनी कर देती तो कभी झल्ला कर कह उठती – ओफ्हो, काकी,  मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ अपना भला बुरा समझती हूँ तुम बेकार ही चिंता करती हो ...
काकी हँस कर कहती,  हाँ हाँ तुम बच्ची नहीं हो पर तुम्हें दुनिया की समझ भी नहीं है ।  
गौर वर्ण की काकी की उम्र कोई 60-65 के आस-पास होगी , परंतु चेहरे पर बहुत ही तेज झलकता था । बहुत ही गांभीर्य था,  एक बार देख लेने के पश्चात पुनः देखने का आकर्षण था,  यौवनावस्था में काकी बहुत ही सुंदर रही होगी । काकी हमारे चॉल  में एक छोटी सी खोली में रहती थीं। बिना काम के बैठ समय काटना उन  का स्वभाव नहीं था ।  उन को चॉल में सभी मानते थे उन के ना रहने से चॉल के सभी काम प्रायः बंद हो जाते।  चाहे किसी का भी काम हो कैसा भी काम हो काकी हमेशा तैयार रहतीं।  काकी कभी दाई बन जाती तो कभी वैध कभी महाराजिन तो कभी हलवाई । काकी के हाथ में जादू था । काकी के धीर गंभीर व्यक्तित्व और निस्वार्थ सेवा के स्वभाव के कारण काकी को सभी बहुत प्यार करते परंतु काकी की अपनी ज़िंदगी के विषय में कोई कुछ नहीं जानता था वह सभी के लिए एक रहस्य के समान था ।
मुझे काकी के विषय में जानने की बडी उत्सुकता थी।  काकी मुझे गुडिया कह कर बुलाती और मुझसे बहुत ही स्नेह करती और इसी कारण मैं भी काकी को कभी कभी छेडते हुए पूछ बैठती –
काकी तू तो इतनी सुंदर है काका कैसे थे बोल ना काकी 
पर काकी हमेशा की तरह मुस्कुरा कर मुझे टरका देती। मैंने माँ से पूछा माँ ने कहा –
देख इस चॉल को बने 30 साल हो गए । आज तू काकी को जैसे देख रही है काकी कल भी ऐसे ही थी उसकी हालत में कोई बदलाव नहीं आया है हाँ थोडी बूढी हो गई हैं  चॉल के ही लोग उनकी देखभाल करते हैं आज तक उनके घर से कोई नहीं आया न कोई रिश्तेदार ना कोई सगा
काकी का खर्चा कैसे चलता है माँ
तू तो जानती है काकी के हाथों में जादू है बस यही उसकी जीविका का भी साधन है वैसे भी काकी एक जून ही खाना खाती है और जहाँ खाना बनाने जाती है वहीं उसका भी खाना हो जाता है और खोली तो चॉल वालों ने ही काकी को दिया है और कपडे- लत्ते उनकी भी व्यव्स्था हो ही जाती है । जब काकी सबके लिए इतना कुछ करती है तो चॉल वालों की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है न । चल छोड  तू क्यों इतना परेशान हो रही है  जा जाकर अपना काम देख कह कर माँ ने प्यार से झिडका ।
मेरा मन तो काकी के आस-पास ही घूमता रहता था। मेरे बाबा नहीं थे माँ ही सब कुछ थी पर काकी बिना संबंध के भी अपनी ही थी काकी को मुझसे बहुत स्नेह और मुझे उनके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता ।
उस दिन मैं घर के सामने खडी थी, तभी डाकिया, काकी के नाम का एक मनीऑर्डर लेकर आया।  काकी के घर ताला लगा था,  डकिए ने मुझसे पूछा  मुझे भी ज़रा आश्चर्य हुआ कि काकी आज सुबह से मुझे भी  नहीं दिखी थी परंतु काकी के लिए मनी ऑर्डर कहाँ से आया है, यह जानने की अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाई और मनी ऑर्डर को हाथ में लेकर भेजने वाले का पता देखा , मनी ऑर्डर पर हैदराबाद की मोहर थी। डाकिए से कह दिया कि काकी बाहर गई हैं  कल आना डाकिया अपनी राह चला गया और मैं असमंजस में खडी रही ।
कुछ देर बाद हाथ में एक डिब्बा लेकर काकी को आते देखा
काकी बडी खुशबू आ रही है डिब्बे में क्या है ?
काकी थकी थी पर मुस्कुरा कर  मुझे डिब्बा पकडते हुए बोली – अपने शर्मा जी के घर सगाई है तो उन्होंने लड्डू बनाने  के लिए बुलाया था तुझे लड्डू बहुत पसंद है न इसीलिए लेकर आई हूँ पर तू यहाँ अकेली क्यों खडी है अंधेरा छाने  लगा है और घर में  दियाबाती भी नहीं किया है  अभी तक माँ नहीं आई क्या ?
नहीं काकी, बस आती ही होगी, मैं अभी दिया बाती कर देती हूँ , और हाँ काकी आप के लिए हैदराबाद से एक मनीऑर्डर आया था, कौन है वहाँ?
मेरी बात सुनकर काकी  सन्न रह गई और उनके चेहरे का रंग फीका पड गया  काकी को देख कर तुरंत मैंने कहा –छोड न काकी तुझे बुरा लग रहा है तो मैं कुछ नहीं पूछूँगी
ना रे बच्चा ऐसा कुछ नहीं है चल दियाबाती करके ताला लगा कर मेरे साथ चल ।
मुझे लगा शायद काकी कुछ कहना चाहती है मुझे भी उत्सुकता थी काकी के बारे में जानने की तो मैं काकी के साथ चल पडी।  
काकी ने खोली का दरवाज़ा खोल कर चटाई बिछई और लालटेन जलाई।  
काकी सारे चॉल में बिजली है पर  तूने क्यों नहीं लगवाई  ?
रहने दे रे मुझे कौन लिखाई पढाई करनी है जो बिजली लगवाऊँ
काकी की खोली बहुत ही साफ-सुथरी थी कोई खास सामान तो नहीं था पर जो भी था करीने से सजा हुआ था । मैंने एक नज़र दौडा कर सब देख लिया था।
काकी दीवार से टिक कर पैर लंबे कर बैठ गई । बहुत थकी हुई थी । आज चॉल में भी बहुत शांति थी, नहीं तो चॉल के बच्चे, भगवान बचाए, काकी को घेर कर चिलप्पों मचाते रहते, कहानी सुनाने कि ज़िद करते , आज सब निशब्द था।
आज काकी हमेशा की तरह नहीं थी ।
काकी क्या सोच रही हो ? क्या सुबह से लड्डू बनाने में लगी रही? बहुत थक गई हो न?
कुछ नहीं रे आज बस थोडा काम अधिक था दुनिया में किसी को किसी की चिंता नहीं रहती वैसे मैं भी ऐसी ही हूँ मेरी भी तेरे जैसे एक बेटी होती तो . . . काकी कहते कहते रूक गई
हैदराबाद में आप का कोई रिश्तेदार है क्या ? मैंने फिर पूछा
हमेशा से धीर-गंभीर रहने वाली काकी फूट-फूट के रोने लगी । सभी को सांत्वना देने वाली काकी को रोते देखकर मुझे बहुत दुखः हुआ ।
क्या बात है काकी क्या हुआ ?
सारी ज़िंदगी यूँ ही गुज़र गई कोई पूछने वाला नहीं आया मेरी भी क्या ज़िंदगी है
आपको किसने पैसे भेजे काकी ? मैंने फिर पूछा
मेरे पति का बेटा होगा काकी व्यंग्य से बोली
काकी आप के पति का बेटा आपका ही बेटा हुआ न  मैंने आश्चर्य से पूछा
मेरा बेटा होता तो क्या मैं ऐसे दर-दर भटकती ‍! घर-बार-संसार पति पुत्र ये सब मेरे नसीब में नहीं है रे ...छोड न मेरी लंबी कहानी है कहते हुए आगे कहने लगी
मैं अपनी माँ के साथ रहती थी , मेरे बाबा नहीं थे माँ मुझसे बहुत प्यार करती थीं  मैं स्कूल जाती थी पर माँ ने 10 साल की उमर में मेरी पढाई छुडा दी वो मेरी शादी करा देना चाहती थी । 12 साल की उमर में मेरी शादी हैदराबाद में रहने वाले 22 साल के वकील से करवा दी गई । कुछ दिन बाद लेने आऊँगा कहा परंतु   वे मुझे लेने नहीं आए कोई न कोई बहाना बना कर आना टालते रहे इस तरह मैं विवाह के बाद भी माँ के घर ही रह गई । मगर मैं कुछ ना कह पाती बस घुटती रहती और एक एक साल गिन- गिन कर काटती जाने वो कब आए पर वो कभी नहीं आए ।
मेरे घर के  पडोस में राजू  नाम का एक लडका रहता था दिखने में अच्छा भला था और बातों में मजाकिया . . .  काकी रूक गई
आगे क्या हुआ काकी मैंने पूछा
गहरे कुँऐं से आती आवाज़ की भाँति काकी की आवाज़ आई –
मेरा यह हाल उसी के कारण हुआ। मैं बहुत सुंदर थी मेरे रूप को देख कर कई लोग जलते थे। राजू भी मुझ पर आसक्त था मैं उससे बात तो करती थी पर मैंने उसे कभी करीब आने नहीं दिया परंतु उसकी आसक्ति दिनों दिन बढती ही जा रही थी यह देख कर मैं उससे दूर रहने लगी ।
एक दिन माँ मंदिर गई थी और मैं कुँऐं पर कपडे धो रही थी । कपडे धो कर मैं अंदर जाने लगी तो सर्र की आवाज़ आई। पास से शायद एक साँप गुज़रा था मैं डर कर चकरा कर गिर गई आवाज़ सुनकर राजू दौड कर बाहर आया और मुझे उठा कर अंदर ले गया पानी पिलाया और मेरे सिर को सहलाता बैठा रहा माँ आई तो उठ कर चला गया ।
अचानक एक दिन पडोसन से माँ का झगडा हो गया। उन्होंने मेरे बारे  में बहुत अनाप-शनाप  कहा और इल्ज़ाम लगाते हुए चिठ्ठियाँ भी लिख डाली। राजू को भी बहुत अपमानित किया गया वह रोज-रोज की इस किच-किच से परेशान होकर गाँव छोड कर जाने कहाँ चला गया। मेरे पति को यही एक बहाना मिल गया कोर्ट में अर्जी डाल कर मुझसे अलग हो गए और फिर से शादी कर ली अब दो बेटे हैं मैं अकेली रह गई । मैं बंजर धरती की तरह सारी ज़िंदगी खाली पडी रही । मैं दुनिया की नज़रों में न सुहागिन बनी और न विधवा। मैं अंदर ही अंदर इस दौरान गुज़रे सारे हादसों को झेलती रही ।
इतना कह कर काकी ने लंबी सांस ली और अपनी पेटी खोल कर एक पुराना पत्र निकाला । पत्र काफी पुराना था हर मोड से फटने लगा था काकी को यह पत्र उनके पति ने बहुत ही डाँट कर लिखा था
आपने अभी तक यह पत्र क्यों संभाल कर रखा है काकी यह कोई प्रेम पत्र  तो नहीं है।
हाँ रे पर मेरे पति के द्वारा लिखा गया यह एकमात्र पत्र है इसीलिए संभाल कर रखा है । मेरी आँखें भर आयीं ।
छोड ना ये सब, मेरी चिंता मत कर, जा घर जाकर खाना खा कर सो जा कल कॉलेज भी जाना है ।
मैं भारी मन से काकी के घर से निकली। काकी की कहानी सुनकर मेरी समझ में आया कि काकी क्यों मुझे इतनी हिदायत देती हैं। सुबह की एक खबर भी दिमाग में कौंध गई कि बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए बना कानून । सच ही है बाल विवाह के कारण मेरी काकी और न जाने कितनी काकियों का जीवन इस तरह सूना हो गया होगा। इस प्रथा पर रोक लगनी ही चाहिये।
साथ ही गाँधीजी की कही बात याद आई कि भले ही नारी शारीरिक रूप से पुरुष से कमज़ोर हो पर वह हमेशा मानसिक रूप से पुरुष से बहुत अधिक बलवान है ।
अगली सुबह डाकिए ने आवाज़ दी कि काकी बुला रही है जाने क्या बात हो गई सोच कर काकी के पास गई तो काकी बाहर ही खडी थी। आज काकी बहुत ही शांत और खुश दिख रही थी ऐसा लग रहा था जैसे उनके सर से बहुत बडा भार उतर गया हो
क्या बात है काकी ?
देख गुडिया यह मनी ऑर्डर मुझे नहीं चाहिए । मुझे न अभी और न कभी पैसे चाहिए, मुझे किसी की करूणा नहीं चाहिए, मैं अपने बलबूते  पर खुश हूँ ,आईंदा कभी मनी ऑर्डर न भेजे तू उस पर ऐसा लिख दे , और लौटा दे । डाक वाले भाई तुम इसे वापस ले जाओ ।
काकी का यह निर्णय उनके झुर्रियों से भरे मुख पर और मिर्च कूटने वालो हाथों पर मुस्कुरा कर खेलने लगी मुझे अपनी कविता याद आ गई
मैंने तो नहीं देखा है
ज़िंदगी को
पर महसूस किया है
एक चेहरे पर
ज़िंदगी को
होंठो पर हंसी सदा
आँखों में जीने की अदा
जीने की लेकर श्रद्धा ' एक वृद्धा  मेरी काकी

स्वर्ण ज्योति

Tuesday, November 20, 2007

माटी का दिया

सांध्य रवि ने कहा
मेरे बाद होगा कौन?
रह गया सारा जग
सुनकर निरूत्तर मौन

एक नन्हें दिए ने
तब कहा कि " नाथ
जितना मुझसे हो सकेगा
मैं दूँगा साथ"

कि छोटा-सा हूँ मैं
माटी का एक दिया
खुद जलता हर पल
जग रोशन करता पल-पल

माना मुझमें है नहीं
सूरज की-सी रोशनी
मुझमें है नहीं
चँदा की-सी चाँदनी
पर मुझमें कोई दाग नहीं
और न लगे मुझें ग्रहण कभी

हो चाहे मेरे तले अँधेरा
पर रोशन हो हर बसेरा
कि मैं एक छोटा-सा
माटी का दिया


Friday, March 09, 2007

पानी

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

तेरा नहीं कोई रंग
पर निराले तेरे ढंग

तू जीवन की रस धार
तुझमें बसे सारा संसार

कभी बूँदें तो कभी बौछारें
कभी बरखा तो कभी बाढें

तेरे कितने ही नाम
पूजे हम तेरे धाम

कहीं तू माता तो कहीं सुता
कहीं तू पुत्र तो कहीं मित्र

तेरा विचित्र रूप सुनामी
बना गया जीवन को बेमानी

तेरी लीला अपरम्पार
तू लगाए भव सागर पार

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

यह कविता पाँडीचेरी में सुनामी से हुई
तबाही पर लिखी गई थी।

काग़ज़ और कलम

एक दिन जब मैंनें
कुछ शब्द लिखें
तत्क्षण काग़ज़ पर
कुछ आँसू देखे

हर्फ़ सब हुए थे तर
रंग हुआ था बदतर
हादसा था अज़ीब
कह रहा था काग़ज़
कलम से अपना नसीब

तुम मुझ पर क्यों हो फिरती
रंगरूप मेरा बिगाड हो देती
मुझे काले-नीले रंगों से
क्यिं हो भर देती
किसी के अस्तित्व को निखार
मुझे कलंकित हो कर देती

मैं नहीं मानती
तुम्हारा तर्क
तुम्हारी क्या कीमत
बिना हर्फ़
रहोगे कोरे तो
पडे रहोगे कोने में
मैंनें ही पहुँचाया है
तुमको कोने-कोने में

छोडो यूँ न करो तकरार
बढाओ न बात को बेकार
एक शाश्वत सत्य यह जान लो
तुम दोनों हो समान मान लो


यह कविता सृजन गाथा पत्रिका में भी छप चुकी है

Tuesday, February 27, 2007

खूनी सागर

आज दिन भर रहा
उसका साया
मेरे साथ फिरता रहा
बनकर छाया

ज्यों ही पल-पल
दिन गहराया
त्यों-त्यों मेरा मन
घबराया कि
वक्त ने वही क्षण
है दुहराया

आज फिर खून हो गया
गगन पुनः लाल हो गया

मैं दौडा, भागा भी
चीख कर था उसे
रोका भी पर
अफ़सोस सारे प्रयत्न
हुए विफल
आज सागर ने फिर
सूरज को था निगल


मैं स्तब्ध सा था खडा
आँखें हुई थी सजल

Saturday, February 17, 2007

माँडू
मेरे सामने एक तस्वीर है
माँडू का जहाज महल
पुण्य-पवित्र नर्मदा के तट पर
माँग रहा न्याय समय के दर पर

बाज़ बहादुर के दीवानगी का
रूपमती के रूप लावण्य का
सबूत
आज बन गया
ताबूत
माँडू का जहाज महल

इतिहास के पन्नों पर शाश्वत
हमारी संस्कृति का विरासत
गुमनामी के अँधेरों से होकर आहत
गूँजें आवाज़, करे खँडहरों से सवालात

नर्मदा के कलकल में वह स्वर नहीं
रानी का मन मोह लेती थी जो कभी
सिसक रही थी उसकी कलकल
अपनी ज़र्ज़र अवस्था के देख पल

पाकर रूखा-सूखा स्पर्श
आज वह भी हो गए हैं चुप
बन गए होकर विवश
कैलेंडर की एक तस्वीर
देख इसे ही शायद कोई
समझे उनकी पीर

Thursday, February 15, 2007

शिवरात्री के उपल्क्ष्य पर

जोगी

जोगी है आया तेरे द्वारे
जटाजूट भस्म विभूत हैं धारे

प्रिय दरसन की आस है पर
भवति भिक्षांह देहि पुकारे

नील अंग है मृग छाला वसन
भूत पिशाच का देव करे भजन

वृषभ पर सवारी है करे
ताज बना शीश पर भागीरथी धरे

कांधे सर्प गले मुण्डन माला
शशि रख कर दिखता है आला

भक्ति प्रेम का है मतवाला
पी जाए विष भी समझ हाला

भ्रमित होकर तकते दृग नयन
गोरी का मन कहे यही मेरा सजन
राह के दऱख्त

काश.....
राह पर खडे दऱख्त
कुछ बोल पाते
अपनी ज़बानी अपनी गवाही
दे पाते तो
कितने किस्से कह पाते
काश......
ये कुछ बोल पाते

पंथी को छाया
राही को साया
भूलों को राहें
भटकों को बाँहें
देकर भी ये हैं
कितने.... अकेले

हरियाली के मेले
हैं कितने अलबेले
छाँव में अपनी
नन्हें नीडों को पाले
पर हैं अकेले
तन्हाई का दुःख झेलें

काश.....
ये कुछ बोल पाते
तो अपनी व्यथा-कथा
अपनी दर्द बाँट पाते
काश....
राह के दऱख्त
कुछ बोल पातें.........

Sunday, February 11, 2007

नासमझ

मौन ही ग़र तेरी भाषा होती तो
मैं सब कुछ समझ लेता पर
तेरी तो निराली अदा निकली जो
चुप रहकर भी बोल निकली

कुछ कही-अनकही बातों से
कुछ बुझी-अनबुझी निगाहों से
तेरी दास्तां का इल्म न मुझे हो सका
फिर कैसे कहूं सब समझ सका

थर्राते लबों को इकरार समझूँ
या बहते अश्कों को इनकार
झुकी पलकों को समझूँ हया
या समझूँ सुर्ख गालों को बला

तेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
कैद होकर रह गया हूँ मैं
दिल मे मेरा गया है उलझ
कैसे समझाऊँ ओ नासमझ

Friday, February 09, 2007

कन्नड के प्रसिद्ध चलन चित्र नायक, परिवेशवादी, साहित्यकार श्री सुरेश हेब्बलिकर के द्वारा कृति विमोचन, साथ में कर्नाटक राज्य स्रकार में (सेवानिवॄत) मुख्य अरण्य अधिकारी तथा रचनाकार जो मेरे बडे बाबूजी भी हैं , श्री कृष्ण स्वामी जी , और मध्यप्रदेश में सिंचाई विभाग में मुख्य अभियंता (सेवानिवृत) मेरे बाबूजी श्री ए. नागराज राव और मैं
मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद तथा अखिल कर्नाटक हिन्दी साहित्य अकादमी के द्वारा आयोजित पुस्तक "अच्छा लगता है" का लोकार्पण समारोह
नवीं अखिल भारतीय कन्नड सम्मेलन में मेरी कृति "अच्छा लगता है" का विमोचन श्री रामे गौडा द्वारा साथ में कन्नड की प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती कमला हम्पना और उनके साथ प्रसिद्ध गायक श्री शिवमोगा सुब्बण्णा दूसरी ओर श्रीमान हम्पना और मैं स्वयं

Wednesday, February 07, 2007

आज की राजनीति पर एक व्यंग्य


नया कुरुक्षेत्र

खेल रहा है दाँव शकुनि -सा

साम-दाम-दंड-भेद अपना कर
भोग रहा है राज दुर्योधन-सा

सत्यमेव जयते हैं कुछ कहते
पर रखें ज़ुबां बंद विदुर-सा

हैं कई लक्ष्य निशाने पर
नहीं है तीरंदाज अर्जुन-सा

सौ करोड की सेना है पर
नहीं है सेनापति द्रोण-सा

है खडा तैयार प्रगति का रथ
नहीं है हाँकने को सारथी कृष्ण-सा

यही पूछे है जन-मन यक्ष प्रश्न
नहीं है उत्तर देने को धर्मपुत्र युधिष्ठर-सा

था वह युद्ध पाँडव और कौरव का
है यह युद्ध मानव से मानव का

बना था केवल अट्ठारह दिन का युद्ध्क्षेत्र

कैसी है ये राजनीति कैसा है ये राष्ट्र
कुछ बने हैं गांधारी कुछ हैं धॄतराष्ट्र

शतरंज बिछा कर हर कोई

आज तो बन गया है जीवन ही कुरुक्षेत्र

कैसी ये राजनीति कैसा ये राष्ट्र......?

Monday, January 29, 2007

आज के युवा वर्ग पर लिखी है यह कविता अनेक आशाएँ लेकर शिक्षा पूरी करना और फिर यूँही भटकना और शायद इस भटकाव से ही किसी गलत राह पर चलने की मजबूरी को पालना

युवा

एक अधखुला झरोखा
दो प्यासे नयन झाँकते
इधर-उधर आते जाते
लोगो को उत्सुकता से ताकते

अस्तित्व-अस्मिता की लेकर आस
ढूँढें हैं गली-गली ब्रह्म में रख विश्वास
सत्य और यथार्थ का एहसास
जलाता है आशाओं को जैसे जले कपास

दिल की आग पर उबलता है
चढती-ढलती सांसों का पानी
शोला बनकर है भडकता
बैचेन मजबूर जवानी

राख के नीचे चिनगारियों का
आग बनने का है सबब
छोड नीति-रीति और तहज़ीब
गर्म खून में आई रवानी

हाय रे जवानी

सुरमई बनी सिन्दूरी शाम
समय का पहिया घूमा दूसरे धाम
जिन्दगी ने नहीं दिया कोई नाम
अब भी यह वही इंतजार का काम

Wednesday, January 10, 2007

विश्व का एकमात्र काव्य

इस दुनिया मे अनगिनत भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती है, समझी जाती है, लिखी और पढी जाती हैं। इतिहास साक्षी है कि कई मतभेदों का कारण भाषावाद रहा है। जिस समाज में जातिवाद का प्रचलन हो उस समाज में भाषावाद स्वयंमेव ही जन्म ले लेता है।
आदि मानव के लिए अंगीकाभिनय ही भावाभिव्यक्ति का साधन था । इस व्यवस्था ने आगे चलकर चित्राभिव्यक्ति का रूप धारण कर लिया यह चित्राभिव्यक्ति कोई श्रेष्ठ चित्रकला का प्र्तीक नहीं थी । मानव के द्वारा बोली का अविष्कार करने के कई वर्षों के बाद लिपि का अविष्कार हुआ । लिपि के साथ संख्या भी अवतरित हुई । मानव जब अपने भावों, अनुभावों और अनुभवों को अक्षरों मे उतारने लगा तब साहित्य कानिर्माण हुआ इसे अक्षर लिपि काव्य कहा जाता है । इसी प्रकार स्पंदित होकर भावों -अनुभावों को भाषा की तरह ही समर्थ रूप से प्रकट करने के लिए संख्या रूपी संकेतों का जन्म हुआ इनके द्वारा रचित रचना को संख्या लिपि काव्य कह सकते हैं ।
इस रीति से उपलब्ध संख्या लिपि एकैक आश्चर्य जनक काव्य श्री कुमदेन्दु विरचित
सिरि भूवलय है
सिरि भूवलय विश्व के आश्चर्यों में से एक है ऐसी घोषणा करने में आगे-पीछे सोचने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह एक अपूर्व, अन्यादृश, विशिष्ट , संख्या धारित, सांकेतिक धार्मिक काव्य, जैन धार्मिक काव्य, कन्नड अंक लिपि में लिपि बध्द लेकिन विश्व के ७१८ भाषाओं को अपने गर्भ में रख अपने महोन्नति से विश्व के भाषा साहित्य के लिए एक प्रश्न बन कर खडा, विचित्र और विशिष्ट कला कॄति है । इसी कारण श्री कुमदेन्दु इसे सर्व भाषा मयी कर्नाटक काव्य और विश्व काव्य कहकर संबोधित करते हैं ।
आदि तीर्थंकर होने वाले पुरदेव तीसरे परिनिष्क्रमण कल्याण के बाद वैराग्य परावश होकर समस्त साम्राज्य को अपने पुत्रों में बाँट देते हैं । मुख्य रूप से भरत को "षट्टखंड मंडल" और बाहुबली स्वामी को "पौदनपुरादि महाभाग " प्राप्त होता है । शेष पुत्रों को शेष भूभाग में बँटवारा होता है। उस समय आदि देव की दो पुत्रियाँ कुछ शाश्वत संपत्ति देने का आग्र्ह पिता से करती हैं । तब आदि नाथ वॄषभ स्वामी ज्येषठ पुत्री ब्राह्मी को अप्ने बाँयी तथा छॊटी पुत्री सौन्दरी को अपने दाँयीं गोदी में बिठा कर ब्राह्मी के बाँयें हाथ पर अपने दाँएँ हाथ के अँगूठे से ॐ लिखते हैं । उसमें ६४ अक्षरों के वर्णमाला का सृजन कर " यह तुम्हारे नाम में अक्षर हो" और "समस्त भाषाओं के लिए इतने ही अक्शर पर्याप्त हो" कह कर आशीर्वाद देते हैं । ब्राह्मी से अक्षर लिपि को ब्राह्मी लिपि का नाम पडा । उनके द्वारा ब्राह्मी को " साहित्य शारदे" नाम की शाश्वत संपत्ति प्राप्त हुई ।
वृषभस्वामी अपनी दाँयी गोदी पर बैठी सौन्दरी के दाहिने हथेली पर अपने बाँएँ हाथ के अँगूठे से उसकी हथेली के मध्य भाग पर शून्य लिख कर इस शून्य को मध्य भाग में काटे तो ऊपर का भाग (टोपी के आकार का) और नीचे के भाग को अर्थ पूर्ण ढंग से मिलाते जाए तो ९ अंकों की सृष्टि होगी । इस तरह शून्य से ही विश्व की और गणित में अंकों की सृष्टि को दिखा कर सौन्दरी को गणित अथवा संख्या शास्त्र विशारदे नाम की शाश्वत संपत्ती देते हैं ।
इस प्रकार सौन्दरी के अंक ही अक्शरों के और ब्राह्मी के अक्षर ही अंकों के बराबर होंगें ऐसा स्पष्ट कर दोनों पुत्रियों को दी गई शाश्वत संपत्तो एक ही वज़न की है , कह अंकाक्षर लिपि में भी काव्य रचना की साध्यता का विवरण करते हैं ।
इसी को आधार बना कर मुनि कुमदेन्दु ने अपने सिरि भूवलय काव्य की रचना की जिसमें वे ६४ ध्वनियों का संकेत देते हैं जिसमें हर्स्व, दीर्घ और प्लुतों से मिलकर २७ स्वर, क,च,त,प, जैसे २५ वर्गीय वर्ण य,र,ल,व, अवर्गीय व्यंजन बिन्दु अथवा अनुस्वार (०) विसर्ग अथवा विसर्जनीय (ः) जिह्वा मूलीय (ஃ) (यह तमिल में प्रयोग होता है जो हिन्दी के बिन्दु का प्रतीक है ) उपध्मानीय (ःः) नाम के चार योगवाह सभी मिलाकर ६४ मूलाक्शरों को १ से लेकर ६४ संख्याओं का संकेत देते हैं । यह क्रम रूप से २७गुणा २७ =७२९ बनते हैं । कवि के निर्देशानुसार ऊपर से नीचे , नीचे से ऊपर अंकों की राह पकड कर चले तो भाषा की छंदोबध्द काव्य अथवा एक धर्म, दर्शन, कला, विञान बोधक शास्त्र कृति लगती है ।
यह केवल एक ही कन्नड भाषां प्रतिनिधित्व अंकों में ही होने पर भी विश्व की अनेक भाषाओं, अनेक काव्य शास्त्रों , धर्म, राजनीति, मनोविञान, ज्योतिष्य आदि को समाहित किए हुए है सभी को एक अर्थपूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने वाली विश्व विनूतन आश्चर्यकर रचना होने के कारण इसे अंकाक्षर विञान रूपी विश्व कोष भी कह सकते हैं।

Wednesday, January 03, 2007

इस कविता को एक तस्वीर देख कर लिखि थी जिसमें बर्फ़ से ढकी हिमालय की चोटी और नीचे हरी दूब
कुछ ऐसा ख्याल मन में आया

हिमखंड

ऐ हिमखंड !
तू कर न घमंड

तू दिखे
श्वेत,स्वच्छ, निर्मल
रूई के फ़ाहे-सा कोमल
तू चमके आईने-सा उज्जवल
तू खूबसूरत जैसे चांदनी
तुझमें गई है घुल

पर तुझको यह नहीं एहसास
कि तू भोग रहा है मृत्यु दंड

ऐसे न तू कर हठ
जरा झुक नीचे तो देख
लिखा है हरी दूब ने लेख
तुझ से है जो श्रेष्ठ

कोई सहला तो कोई निहार
है उसको जाता
कोई भोजन, कोई पूजन
के लिए ले जाता
छोडकर अपना धाम
आती दूजे के काम

तेरी है क्या बिसात
कि तू न छोडे अपनी औकात
तू क्या जाने जीवन की बात
कि तू कब रहा जीवन के साथ

तू न पिघले न झुके
न करे धरती स्पर्श

Tuesday, December 26, 2006

अलकों का छल्ला

स्वर्ण विहीन तर्जनी तुम्हारी
बहुत सुन्दर है लगती

दाने चावल के जब चुनती
आँखें कोहीनूर सी चमकती
राह प्रिय की हैं तकती

श्रंगार रहित चेहरा
नाक में लौंंग है पहना
लंबी सुराहीदार गरदन
काला तिल ही है गहना

कंकड जब उछालती
चूडी छन से खनकती
कहीं का कहीं गिर कंकड
आवाज़ ख्न से गूँजाता
आहट प्रिय की जान
मासूम मन है चौंकता

अनगिनत काजों को नकारती
दीवार पर जडी तस्वीर की तरह
दहलीज़ पर बैठी मुस्काती
चेहरे पर अलकों को
खोलती, लपेटती, खेलती
उँगली में छल्ला बना पहनती

स्वर्ण विहीन तर्जनी तुम्हारी
बहुत सुन्दर है लगती

Friday, November 17, 2006

यूँ तो यह कविता एक-बारगी पढने पर साधारण सी प्रेम कविता लगती है परन्तु यह कविता कबीर के राम के लिए निर्गुण भाव को दर्शाती हुई जैसी प्रेम कविता है सच ही है हम अपने राम को कहाँ किस रूप में रख पायेंगें

तेरा अक्स

मैंने तुमको कैसे-कैसे अक्स करना चाहा.....

आँखों में काजल बनाकर रखना चाहा
पर तुम बह गए अश्रु बन कर

होंठों पर मुस्कान बना कर रखना चाहा
पर तुम घुल गए मोम बन कर

गालों में लाली बना कर रखना चाहा
पर तुम उड गए कपूर बन कर

बालों में कली का गजरा बनाकर रखना चाहा
पर तुम मुरझा गए फूल बन कर

हाथों में कँगन बना कर रखना चाहा
पर तुम टूट गए सपना बन कर

पर तुम्हें किसी अक्स की क्या ज़रूरत....

तुम तो महकते हो सांसों में खुशबू बन कर
धडकते हो दिल में धडकन बन कर
गूँजते हो कानों में सरगम बन कर
बहते हो मन में मधु बन कर ।
यह कविता कुछ २५ सालों पहले लिखी थी पर आज भी लगता है कि यह बात उतनी ही सच है जितनी उस समय थी

ख़ूने जिग़र

एक खूबसूरत शाम ढले
कोरे काग़ज़ का टुकडा
दिया था किसी को
"लिख दो" कुछ कह कर कि
जाने अब हम कब मिले.....?

पाया मैंने ऐसा उत्तर....

लिख न पायेंगे कुछ
कैसे कह दें
नहीं आता लिखना कुछ
क्या ऐसा लिख दे

मैं हँस पडी........

दी है उसी ने दुआ
लाल स्याही से
जैसे लिखा हो
ख़ूने जिग़र से

Wednesday, November 15, 2006

हम सभी ने उडते हुए बादलों को देखा है। कई आकार-प्रकार के रूप में देखा है। उन बादलों को देख कर आप के मन में क्या ख्याल आया होगा यह तो मैं नहीं जानती पर मेरे मन में उन बादलों से बात करने की चाह हुई मैं बात भी की जवाब क्या मिला जानते हैं-----जवाब तो मिला पर मैंने बातों ही बातों में उसे चुनौती भी दे दी कैसे ---कुछ ऐसे--

खामोश चुनौती

मैंने बादल से कहा
तुम पर एक कविता
लिखना चाहता हूँ

बादल हँसा..... व्यंग्य से
पूछा उसने.....
क्या तुम्हारी कविता
है मुझ सी रंगी....?
मैंने कहा.....नहीं

क्या तुम्हारी कविता
चंचल, चपल, शांत और
है गंभीर....?
मैंने कहा....... नहीं

धरती आकाश में समाहित
ऐसा मेरा सारा व्यक्तित्व
सॄष्टि के नियम के संग-संग
रचा मेरा अस्तित्व

क्या तुम्हारी कविता
सुंदर मोहक शीतलता
से है शोभिता
मैंने कहा ..... नहीं पता

बादल बोला
जब जीवन के रंग ही न हो
तो कविता क्या
ख़ाक लिखोगे.....?
मैं निरूत्तर
मौन हो गया ।