आज की राजनीति पर एक व्यंग्य
नया कुरुक्षेत्र
खेल रहा है दाँव शकुनि -सा
साम-दाम-दंड-भेद अपना कर
भोग रहा है राज दुर्योधन-सा
सत्यमेव जयते हैं कुछ कहते
पर रखें ज़ुबां बंद विदुर-सा
हैं कई लक्ष्य निशाने पर
नहीं है तीरंदाज अर्जुन-सा
सौ करोड की सेना है पर
नहीं है सेनापति द्रोण-सा
है खडा तैयार प्रगति का रथ
नहीं है हाँकने को सारथी कृष्ण-सा
यही पूछे है जन-मन यक्ष प्रश्न
नहीं है उत्तर देने को धर्मपुत्र युधिष्ठर-सा
था वह युद्ध पाँडव और कौरव का
है यह युद्ध मानव से मानव का
बना था केवल अट्ठारह दिन का युद्ध्क्षेत्र
कैसी है ये राजनीति कैसा है ये राष्ट्र
कुछ बने हैं गांधारी कुछ हैं धॄतराष्ट्र
शतरंज बिछा कर हर कोई
आज तो बन गया है जीवन ही कुरुक्षेत्र
कैसी ये राजनीति कैसा ये राष्ट्र......?
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Wednesday, February 07, 2007
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