आज के युवा वर्ग पर लिखी है यह कविता अनेक आशाएँ लेकर शिक्षा पूरी करना और फिर यूँही भटकना और शायद इस भटकाव से ही किसी गलत राह पर चलने की मजबूरी को पालना
युवा
एक अधखुला झरोखा
दो प्यासे नयन झाँकते
इधर-उधर आते जाते
लोगो को उत्सुकता से ताकते
अस्तित्व-अस्मिता की लेकर आस
ढूँढें हैं गली-गली ब्रह्म में रख विश्वास
सत्य और यथार्थ का एहसास
जलाता है आशाओं को जैसे जले कपास
दिल की आग पर उबलता है
चढती-ढलती सांसों का पानी
शोला बनकर है भडकता
बैचेन मजबूर जवानी
राख के नीचे चिनगारियों का
आग बनने का है सबब
छोड नीति-रीति और तहज़ीब
गर्म खून में आई रवानी
हाय रे जवानी
सुरमई बनी सिन्दूरी शाम
समय का पहिया घूमा दूसरे धाम
जिन्दगी ने नहीं दिया कोई नाम
अब भी यह वही इंतजार का काम
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Monday, January 29, 2007
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