Tuesday, May 01, 2018


                   विश्व का एकमात्र अंक काव्य
                         सिरि भूवलय
                         
विचारों के आदान- प्रदान का सशक्त माध्यम है भाषा।  मानव का मानव से संपर्क माध्यम है भाषा। किंतु भाषा क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई?
मानव ध्वनि संकेतों के सहारे अपने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति करने के लिए जिस माध्यम को अपनाता है उसे भाषा की संज्ञा दी जाती है
भाषा शब्द संस्कृत के भाष् धातु से निषपन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्त वाणी।
भाषा के उत्पत्ति के संदर्भ में कई सिध्दांत प्रचलित है। भाषा की उत्पत्ति इतने प्राचीन काल में हुई कि उस पर विचार करने के लिए हमारे पास आज कोई आधार नहीं है। इस प्रश्न का संतोषजनक और सर्व सामान्य उत्तर ढूंढना कठिन है।
   प्राचीन काल में मानव के लिए अंगिकाभिनय ही भावाभिव्यक्ति का साधन था। इस व्यवस्था ने आगे चलकर चित्राभिव्यक्ति का रूप धारण कर लिया ।  आदि मानव ने चट्टानों, पत्थरों और दीवारों पर अपने भावों को चित्रों के रूप में किया, इसे मानव शास्त्र्ज्ञ चित्र लिपियुग कहते हैं । मानव के द्वारा बोली के अविष्कार करने के कई वर्षों के पश्चात लिपि का अविष्कार हुआ। लिपि के साथ संख्या भी अवतरित हुई। मानव जब अपने भावों अनुभावों और अनुभवों को अक्षर रूप में उतारने लगा तब साहित्य का निर्माण हुआ। इसे अक्षर लिपि  काव्य कहा गया । इसी प्रकार स्पंदित होकर  भावों – अनुभावों को भाषा की तरह ही समर्थ रूप से प्रकट करने के लिए संख्या रूपी संकेतो का जन्म हुआ। इस प्रकार रचित काव्य को संख्या लिपि काव्य कह सकते हैं। इस रीति से उपलब्ध संख्या लिपि एकैक आश्चर्य जनक काव्य कुमुदेंदु विरचित सिरिभूवलय  अंक काव्य होने पर भी इसमें 718 भाषाएँ समाहित हैं। ऐसा कवि का कथन है।
     आज से अर्ध शताब्दी पूर्व इस अंक काव्य  को संग्रहित व संपादन करने के लिए तीन महानुभव पंडित यलप्पा शास्त्री , कर्ल मंगलं श्री कंठैय्या और के.  अनंत सुब्बाराव जी ने अथक प्रयास किया। वर्ष 2003 में यह अंक काव्य ग्रंथ कन्नड अक्षरों के साथ प्रकाशित हुआ। यह इस ग्रंथ का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि यह ग्रंथ लंबे समय तक अपरिचित रहा । वर्ष 2003 में इस ग्रंथ के प्रकाशन के पश्चात इस महान ग्रंथ का हिंदी में अनुवाद करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। अनुवाद करते समय मुझे यह ज्ञात हुआ कि इस अंक ग्रंथ में 64 अंकों को अक्षरों में परिवर्तित कर ग्रंथ को पढने का प्रयास किया गया है । इस अंक ग्रंथ में 64 वर्णमाला है जो ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत आदि ध्वनियों  में विभक्त हुए हैं ।
·        भाषा विज्ञानी भी ध्वनि विज्ञान को अपनी एक शाखा के रूप में स्वीकार करते हैं। ध्वनियाँ शब्द और अक्षर को खंडित करने से प्राप्त होती है ।       
     हिन्दी वर्माला में 44 वर्ण माने गए हैं । परंतु जब हम बात करते हैं तब अनेक उच्चारण ध्वनियाँ होती हैं। उन ध्वनियों को हम लिख नहीं सकते। इन्हीं उच्चारण ध्वनियों को सिरि भूवलय में स्पष्ट किया गया है।
     सिरि भूवलय के अनुसार 27 स्वर, 33 व्यंजन और 4 आयोगवाह हैं। कुल मिला कर 64 ध्वनियाँ या स्वनिम हैं । 
इस ग्रंथ की रचना सातवीं शताब्दी के लगभग हुई थी और भाषा विज्ञान  का प्रादुर्भाव आधुनिक काल में हुआ है । वास्तव  में देखा जाए तो भाषा विज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ,  ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं  होगी। किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रूचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय व प्रेरणा के फलस्वरूप। लगभग तीन-चार दशकों से  यह विषय काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है ।
इस दृष्टि से भाषा विज्ञान और सिरि भूवलय का विश्लेषण एक नई सोच और दिशा प्रदान करने में सहायक है।  यह संपूर्ण ग्रंथ ध्वनियों पर आधारित अक्षरों पर आधारित है। अंक काव्य होने के बावजूद अंकों  को अक्षरों में परिवर्तित करने के पश्चात ही ग्रंथ को पढा  जा सकता है और ध्वनियों के आधार पर ही अक्षरों में परिवर्तित किया गया है।
इस विलक्षण ग्रंथ में मूल विज्ञान विषय, दर्शन का तात्विक विचार, वैद्य  अणु विज्ञान, खगोल विज्ञान, गणित शास्त्र, इतिहास और संस्कृति विवरण, वेद, भगवद गीता के अवतरण सभी समाहित हैं । 
सिरि भूवलय – एक संक्षिप्त परिचय- श्री कुमुदेंदु विरचित सिरि भूवलय 56 अध्यायों का एक जैन ग्रंथ है। परंतु यह परिचित रीति ग्रंथ नहीं है। अर्थात किसी एक भाषा के वर्णमाला के वर्णों का प्रयोग कर तैयार किए गए शब्दों में लिपि बध्द रूप का गद्य-पद्य- निबंध ग्रंथ नहीं है। गणित में प्रयोग किए जाने वाले संख्याओं का प्रयोग कर तैयार किया गया ग्रंथ है । अंकों को अक्षरों के स्थान पर उनके प्रतिनिधि तथा प्रतिरूप के रूप में उपयोग करना ही इसका वैशिष्टय और वैलक्षण है। संस्कृत-प्राकृत और कन्नड भाषा के लिए समान रूप से संबंधित संप्रदाय रूप प्राप्त 64 मूल वर्णों को 1 से लेकर 64 तक के अंक प्रतिनिधित्व करते हैं । प्रत्येक अक्षरों के लिए उपयुक्त अंकों को चौकोर खानों में (27 * 27 = 729) भरे गए अंक राशी चक्र ही इस ग्रंथ के पृष्ठ हैं । कवि इसे अंक काव्य कहकर संबोधित करते हैं। अंक काव्य होने पर भी इसमें 718 भाषाएं निहित हैं। ऐसा कवि का कहना है । कुमुदेंदु की स्व हस्ताक्षर प्रति उपलब्ध नहीं है।
ध्वनि विज्ञान और सिरि भूवलय की ध्वनियाँ- भाषा विज्ञान की एक शाखा    ध्वनि विज्ञान है। जिसमें ध्वनि का अध्ययन किया जाता है। वाक्य को खंडित करने पद मिलते हैं तथा पद को खंडित करने पर शब्द और संबंध तत्व मिलते हैं। संबंध तत्व और शब्द को खंडित करने पर ध्वनियाँ मिलती हैं । इन्हीं ध्वनियों का अध्ययन ध्वनि विज्ञान में किया जाता है। वक्ता ध्वनियाँ उच्चारित  करता है फिर वे  वायु  के द्वारा लाईं जाती हैं और फिर श्रोता उन्हें सुनता है । इन्हीं तीन आधारों पर ध्वनि विज्ञान का वर्गीकरण किया जाता है
सिरि भूवलय में भी अंकों को ध्वनियों के आधार पर अक्षरों का रूप दिया गया है । भाषा विज्ञान के साथ सिरि भूवलय का यही गूढ संबंध है । 
·        सिरि भूवलय में भाषा में ध्वनि का स्थान स्पष्ट होता है।
आज वर्णमाला में 44 वर्णों का प्रयोग होता है । परंतु इस निर्धारण के पूर्व इस विषय पर मतभेद था । हम केवल ह्रस्व एवं दीर्घ स्वरों का प्रयोग करते हैं और उन्हीं को लिखते हैं परंतु सिरि भूवलय यह स्पष्ट रूप से कहता है कि उच्चारण के समय हम केवल ह्रस्व या दीर्घ स्वरों का नहीं वरन प्लुत ( दीर्घ से भी बडा) स्वरों का भी प्रयोग करते हैं । इन ध्वनियों के आधार पर यदि वर्णमाला तैयार की जाए तो 64 अक्षर बन सकते हैं
आदि तीर्थंकर होने वाले पुरदेव तीसरे परिनिष्क्रमण कल्याण के बाद वैराग्य परावश होकर समस्त साम्राज्य को अपने पुत्रों में बाँट देते हैं । उस समय आदि देव की दो पुत्रियाँ कुछ शाश्वत संपत्ति देने का आग्रह पिता से करती हैं । तब आदि नाथ वॄषभ स्वामी ज्येषठ पुत्री ब्राह्मी को अपने  बाँयी तथा छोटी पुत्री सौन्दरी को अपने दाँयीं गोदी में बिठा कर ब्राह्मी के बाँयें हाथ पर अपने दाँएँ हाथ के अँगूठे से ॐ लिखते हैं । उसमें ६४ अक्षरों के वर्णमाला का सृजन कर " यह तुम्हारे नाम में अक्षर हो" और "समस्त भाषाओं के लिए इतने ही अक्षर पर्याप्त हो" कह कर आशीर्वाद देते हैं । ब्राह्मी से अक्षर लिपि को ब्राह्मी लिपि का नाम पडा । उनके द्वारा ब्राह्मी को " साहित्य शारदे" नाम की शाश्वत संपत्ति प्राप्त हुई ।
     वृषभस्वामी अपनी दाँयी गोदी पर बैठी सौन्दरी के दाहिने हथेली पर अपने बाँएँ हाथ के अँगूठे से उसकी हथेली के मध्य भाग पर शून्य लिख कर इस शून्य को मध्य भाग में काटे तो ऊपर का भाग (टोपी के आकार का) और नीचे के भाग को अर्थ पूर्ण ढंग से मिलाते जाए तो ९ अंकों की सृष्टि होगी । इस तरह शून्य से ही विश्व की और गणित में अंकों की सृष्टि को दिखा कर सौन्दरी को गणित अथवा संख्या शास्त्र विशारदे नाम की शाश्वत संपत्ती प्रदान करते हैं ।
 इस प्रकार सौन्दरी के अंक ही  अक्षरों के और ब्राह्मी के अक्षर ही अंकों के बराबर होंगें ऐसा स्पष्ट कर दोनों पुत्रियों को दी गई शाश्वत संपत्ति  एक ही वज़न की है, कह अंकाक्षर लिपि में भी काव्य रचना की साध्यता का विवरण करते हैं । (उपर के चित्र में जो संख्याएँ बनाई गईं  हैं वे कन्नड  की संख्याओं से मिलती- जुलती हैं ।) इसी को आधार बनाकर मुनि कुमदेंदु ने अपने सिरि भूवलय काव्य की रचना की जिसमें वे 64 ध्वनियों का संकेत देते हैं जिसमें
    ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतों से मिलकर २७ स्वर,
,,,, जैसे २५ वर्गीय वर्ण 
,,,, अवर्गीय व्यंजन
बिन्दु अथवा अनुस्वार (०)
विसर्ग अथवा विसर्जनीय (:)
जिह्वा मूलीय () (यह तमिल में  प्रयोग होता है जो हिन्दी के बिन्दु का प्रतीक है)
उपध्मानीय (::) नाम के चार योगवाह

    सभी मिलाकर ६४ मूलाक्षरों को १ से लेकर ६४ संख्याओं का संकेत देते हैं । यह क्रम रूप से २७ गुणा २७ = ७२९ बनते हैं । कवि के निर्देशानुसार ऊपर से नीचे , नीचे से ऊपर अंकों की राह पकड कर चले तो भाषा की छंदोबध्द काव्य अथवा एक धर्म, दर्शन, कला, विज्ञान बोधक शास्त्र कृति लगती है । यह संपूर्ण ग्रंथ ध्वनियों पर आधारित अक्षरों पर आधारित है । अंकों को अक्षरों में परिवर्तित करने के पश्चात ही पढा जा सकता है।
      718 भाषाओं को कन्न्ड काव्य में संयोजित करने के लिए कुछ बंधों का   प्रयोग किया गया है। श्रेणी बंध में आए हुए कन्नड काव्य के पहले अक्षरों को ऊपर से नीचे पढते जाए तो वह प्रकृत काव्य होगा । बीच के 27वें अक्षर से नीचे पढें तो वह संस्कृत काव्य बनेगा । इस रीति से बंधों को अलग-अलग रीतियों से देखा जाए तो विविध बंधों में बहु विधि की भाषाएँ आएँगी ऐसा कवि कहते हैं ।
कवि बंधों के नाम इस प्रकार कहते हैं – चक्र बंध, हँस बंध, पद्म बंध, शद्ध बंध , नवमांक बंध, वरपद्म बंध,  महापद्म, द्वीप,सागर, पल्या, अनुबंध, सरस, शलाका, श्रेणी, अंक, लोक, रोम, कूप, क्रौंच, मयूर, सीमातीत, कामन, पदपद्म, नख, सीमातीत लेख्य बंध, इत्यादि बंधों में काव्यों की रचना की है।
विशेष- * 718 भाषाओं और 363 मतों के अंवय और विचार सिरि भूवलय में दिखाई पडते हैं , कहना ही ग्रंथ की आधुनिकता को दर्शाती है। 
·        संस्कृत, प्राकृत और द्रविड भाषा लिपि के साथ आधुनिक आर्य भाषा जैसे मराठी, गुजराती, बंगाली, उडिया, बिहारी भाषाओं के साथ साहित्य संवर्धनों में तमिल, तेलगु, मलायालम भाषाओं को और यवन, फारसी, खरोष्ठि, तुर्की देशों की भाषाओं का भी यहाँ उल्लेख मिलता है।
·         वीरशैव के उत्त्कर्ष काल तथा मधवाचार्य के काल (1238-1317) अनंतर  प्रवर्तित अद्वैत- द्वैत सिध्दांत भेद भी यहाँ प्रस्तावित 
·         कुमुदेंदु अपने कृति में अनेक जैन क्षेत्रों का उल्लेख करते हैं ।
कुमुदेंदु द्वारा रचित सिरि भूवलय एक मध्य कन्नड भाषा की रचना है । सांगत्य , अनिर्दिष्ट छंद बंध पद्म पंक्तियाँ उस भाषा के वैलक्षणों को लेकर ही रचित है । हाडलु सुलभवादंग नोडलु मेच्चुव गणित (गीत की भाँति सरल और दृष्टि भावन गणित) कहना ही ग्रंथ स्वरूप है।
इस ग्रंथ के सामन्य भाषिक लक्षणों को संग्रहित कर सकते हैं –
·        व्यंजनांत शब्द स्वरांत बने हैं
·        छ- ळ –र ध्वनियों के बीच अंतर न करते हुए उन्हें प्रास स्थान में और अन्यत्र भी प्रयोग किया गया है ।
·        "प" कार घटित शब्द "ह" कार रूप में है।
·        अपूर्व प्राचीन कन्नड समय के शब्द प्रौढ संस्कृत शब्द और उनके समासों का प्रयोग नहीं हुआ है ।
·        अन्य देश, नवीन कन्नड काल के शब्द आज के व्यव्हार भाषा के चलन में रहने वाले शब्द रूप भी यहाँ-वहाँ दिखई पडते हैं ।
·        प्रासाक्षरों के प्रयोग में शिथिलता है ।
·        वाक्य रचना में सरलता और सौलभ्यता से दिखाई पडते हैं । रचना की अडचन और प्रौढता उतनी दिखाई नहीं पडती है ।
·        छ कार और ळ कार के लिए क्रम से "रळ"  "कुळ"  जैसे 13 वीं सदी के बाद के संकेत नामों का प्रयोगा किया गया है ।
भाषाओं के लिए कुमुदेंदु ने भाषा और लिपि दोनों बनी हुई स्व भाषा कन्नड को आधार भाषा के रूप में चुना है । यहाँ धवल टीकाओं के सिद्धांत शास्त्र,  सार वस्तु विवरण के लिए लेकर, नवमांक पद्धति/ श्रेणीगति/ चक्र  बंध विधान में चमत्कारिक रूप से ग्रंथ रचना की गई है। यही भूवलय सिरि भूवलय नाम का 56 अध्यायों का सिद्धांत ग्रंथ है । इस ग्रंथ की भाषाओं को वस्तु विस्तार को निरूपित करने का आज तक जो भी प्रयत्न हुए हैं , इन्हें आगे बढाना  अद्ययन कर्त्ताओं के सामर्थ्य पर आधारित है ।  
  संस्कृत –प्राकृत और कन्नड भाषा के लिए समान रूप से संबंधित संप्रदाय रूप प्राप्त 64   मूल वर्णों को 1 से लेकर 64 तक के अंक प्रतिनिधित्व करते हैं। यह केवल एक ही कन्नड भाषा प्रतिनिधित्व अंकों में ही होने पर भी विश्व की अनेक भाषाओं, अनेक काव्य शास्त्रों , धर्म, राजनीति, मनोविज्ञान, ज्योतिष्य आदि को समाहित किए हुए है।  
    कुमुदेंदु की स्व हस्ताक्षर प्रति उपलब्ध नहीं है। सभी विषयों की जानकारी ग्रंथ में से निकालने के लिए आधुनिक शोध से तुलना करने के लिए सतत प्रयत्न करना अभी शेष है। विविध क्षेत्रों से गणितज्ञ और भाषा विद् हाथ मिलाएँ तो अनेक लुप्त होते जा रहे ग्रंथ और भाषाओं को पुनः पहचाना जा सकता है प्रकाश में लाया जा सकता है।  साथ ही उच्चारण ध्वनियों की सहायता से लिपि लिखने की रीति में परिवर्तन हो सकता है। जिससे अनुवाद की समस्या भी कुछ सीमा तक सुलझ सकती है।

                     शुभम्
स्वर्ण ज्योति
नं 30, 1 ला माला, 1ला क्रास,
बृंदावन, सारम पोस्ट
पॉण्डिचेरी 605013
फोन- 9443459660



Saturday, April 21, 2018

लम्हें

😊
कभी मसाले के डिब्बे में तो कभी दाल के
कभी तकिए के नीचे तो कभी साड़ी के
छोटे-छोटे -से कुछ लम्हें
छिपाकर रखे थे
सिंदूर की डिबिया में तो कभी काजल की
चूड़ियों के बक्से में तो कभी गहनों के
कुछ रंग-बिरंगे सपने जोड़ कर रखे थे
हर दिन की दिनचर्या में उन्हें सहला लेती
एक दिन उन्हें जीने की चाह में बतिया लेती
आज सोचा उनसे खुद को बहलाऊँ
सज धज कर खुद को रिझाऊं
जो अक्स अपना देखा तो पाया
मैं तो कहीं नहीं मेरे जैसी कोई और थी
न जाने कब
हींग की छौंक में दाल के गलने पर
तकिए के बदलने में साड़ी के खुलने पर
सारे लम्हें छीत गए
न जाने कब
सिंदूर के धुलने पर
काजल के फैलने से
चूड़ी के टूटने पर
गहनों के बदलने से
सारे सपने रीत गए
उन्हें सहला कर देखते देखते
उन्हें जीने की चाह में
पल पल एक एक दिन बीत गए
आज अभी जीने की सीख दी गए.😊🌹

Thursday, March 29, 2018


मनीऑर्डर
मैंने पुस्तकें उठाई और एक बार फिर अपना चेहरा आईने में निहारा तो खुद-ब- खुद मुस्कुरा उठी। हूँ सुंदर दिख रही हो आईने  ने कहा – मैं कॉलेज जाने के लिए बाहर निकली तो काकी की आवाज़ सुनाई दी,  यह कोई आज की बात नहीं थी रोज ही का सिलसिला था –
काकी ने हाथ से रोकते हुए कहा – देख गुडिया तू लडकों के कॉलेज में पढती है, ज़रा खयाल रखा कर,  सावधान रह,  किसी से अधिक दोस्ती मत  करना,  अरे दुपट्टा तो ठीक से ओढ .... आदि आदि 
ऐसी हिदायतें  काकी रोज ही देती । सभी बडे-बूढों की भाँति काकी भी हिदायत देती,  यह मुझे सहज ही लगता था , इसी कारण मैं कभी सुनी-अ‍नसुनी कर देती तो कभी झल्ला कर कह उठती – ओफ्हो, काकी,  मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ अपना भला बुरा समझती हूँ तुम बेकार ही चिंता करती हो ...
काकी हँस कर कहती,  हाँ हाँ तुम बच्ची नहीं हो पर तुम्हें दुनिया की समझ भी नहीं है ।  
गौर वर्ण की काकी की उम्र कोई 60-65 के आस-पास होगी , परंतु चेहरे पर बहुत ही तेज झलकता था । बहुत ही गांभीर्य था,  एक बार देख लेने के पश्चात पुनः देखने का आकर्षण था,  यौवनावस्था में काकी बहुत ही सुंदर रही होगी । काकी हमारे चॉल  में एक छोटी सी खोली में रहती थीं। बिना काम के बैठ समय काटना उन  का स्वभाव नहीं था ।  उन को चॉल में सभी मानते थे उन के ना रहने से चॉल के सभी काम प्रायः बंद हो जाते।  चाहे किसी का भी काम हो कैसा भी काम हो काकी हमेशा तैयार रहतीं।  काकी कभी दाई बन जाती तो कभी वैध कभी महाराजिन तो कभी हलवाई । काकी के हाथ में जादू था । काकी के धीर गंभीर व्यक्तित्व और निस्वार्थ सेवा के स्वभाव के कारण काकी को सभी बहुत प्यार करते परंतु काकी की अपनी ज़िंदगी के विषय में कोई कुछ नहीं जानता था वह सभी के लिए एक रहस्य के समान था ।
मुझे काकी के विषय में जानने की बडी उत्सुकता थी।  काकी मुझे गुडिया कह कर बुलाती और मुझसे बहुत ही स्नेह करती और इसी कारण मैं भी काकी को कभी कभी छेडते हुए पूछ बैठती –
काकी तू तो इतनी सुंदर है काका कैसे थे बोल ना काकी 
पर काकी हमेशा की तरह मुस्कुरा कर मुझे टरका देती। मैंने माँ से पूछा माँ ने कहा –
देख इस चॉल को बने 30 साल हो गए । आज तू काकी को जैसे देख रही है काकी कल भी ऐसे ही थी उसकी हालत में कोई बदलाव नहीं आया है हाँ थोडी बूढी हो गई हैं  चॉल के ही लोग उनकी देखभाल करते हैं आज तक उनके घर से कोई नहीं आया न कोई रिश्तेदार ना कोई सगा
काकी का खर्चा कैसे चलता है माँ
तू तो जानती है काकी के हाथों में जादू है बस यही उसकी जीविका का भी साधन है वैसे भी काकी एक जून ही खाना खाती है और जहाँ खाना बनाने जाती है वहीं उसका भी खाना हो जाता है और खोली तो चॉल वालों ने ही काकी को दिया है और कपडे- लत्ते उनकी भी व्यव्स्था हो ही जाती है । जब काकी सबके लिए इतना कुछ करती है तो चॉल वालों की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है न । चल छोड  तू क्यों इतना परेशान हो रही है  जा जाकर अपना काम देख कह कर माँ ने प्यार से झिडका ।
मेरा मन तो काकी के आस-पास ही घूमता रहता था। मेरे बाबा नहीं थे माँ ही सब कुछ थी पर काकी बिना संबंध के भी अपनी ही थी काकी को मुझसे बहुत स्नेह और मुझे उनके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता ।
उस दिन मैं घर के सामने खडी थी, तभी डाकिया, काकी के नाम का एक मनीऑर्डर लेकर आया।  काकी के घर ताला लगा था,  डकिए ने मुझसे पूछा  मुझे भी ज़रा आश्चर्य हुआ कि काकी आज सुबह से मुझे भी  नहीं दिखी थी परंतु काकी के लिए मनी ऑर्डर कहाँ से आया है, यह जानने की अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाई और मनी ऑर्डर को हाथ में लेकर भेजने वाले का पता देखा , मनी ऑर्डर पर हैदराबाद की मोहर थी। डाकिए से कह दिया कि काकी बाहर गई हैं  कल आना डाकिया अपनी राह चला गया और मैं असमंजस में खडी रही ।
कुछ देर बाद हाथ में एक डिब्बा लेकर काकी को आते देखा
काकी बडी खुशबू आ रही है डिब्बे में क्या है ?
काकी थकी थी पर मुस्कुरा कर  मुझे डिब्बा पकडते हुए बोली – अपने शर्मा जी के घर सगाई है तो उन्होंने लड्डू बनाने  के लिए बुलाया था तुझे लड्डू बहुत पसंद है न इसीलिए लेकर आई हूँ पर तू यहाँ अकेली क्यों खडी है अंधेरा छाने  लगा है और घर में  दियाबाती भी नहीं किया है  अभी तक माँ नहीं आई क्या ?
नहीं काकी, बस आती ही होगी, मैं अभी दिया बाती कर देती हूँ , और हाँ काकी आप के लिए हैदराबाद से एक मनीऑर्डर आया था, कौन है वहाँ?
मेरी बात सुनकर काकी  सन्न रह गई और उनके चेहरे का रंग फीका पड गया  काकी को देख कर तुरंत मैंने कहा –छोड न काकी तुझे बुरा लग रहा है तो मैं कुछ नहीं पूछूँगी
ना रे बच्चा ऐसा कुछ नहीं है चल दियाबाती करके ताला लगा कर मेरे साथ चल ।
मुझे लगा शायद काकी कुछ कहना चाहती है मुझे भी उत्सुकता थी काकी के बारे में जानने की तो मैं काकी के साथ चल पडी।  
काकी ने खोली का दरवाज़ा खोल कर चटाई बिछई और लालटेन जलाई।  
काकी सारे चॉल में बिजली है पर  तूने क्यों नहीं लगवाई  ?
रहने दे रे मुझे कौन लिखाई पढाई करनी है जो बिजली लगवाऊँ
काकी की खोली बहुत ही साफ-सुथरी थी कोई खास सामान तो नहीं था पर जो भी था करीने से सजा हुआ था । मैंने एक नज़र दौडा कर सब देख लिया था।
काकी दीवार से टिक कर पैर लंबे कर बैठ गई । बहुत थकी हुई थी । आज चॉल में भी बहुत शांति थी, नहीं तो चॉल के बच्चे, भगवान बचाए, काकी को घेर कर चिलप्पों मचाते रहते, कहानी सुनाने कि ज़िद करते , आज सब निशब्द था।
आज काकी हमेशा की तरह नहीं थी ।
काकी क्या सोच रही हो ? क्या सुबह से लड्डू बनाने में लगी रही? बहुत थक गई हो न?
कुछ नहीं रे आज बस थोडा काम अधिक था दुनिया में किसी को किसी की चिंता नहीं रहती वैसे मैं भी ऐसी ही हूँ मेरी भी तेरे जैसे एक बेटी होती तो . . . काकी कहते कहते रूक गई
हैदराबाद में आप का कोई रिश्तेदार है क्या ? मैंने फिर पूछा
हमेशा से धीर-गंभीर रहने वाली काकी फूट-फूट के रोने लगी । सभी को सांत्वना देने वाली काकी को रोते देखकर मुझे बहुत दुखः हुआ ।
क्या बात है काकी क्या हुआ ?
सारी ज़िंदगी यूँ ही गुज़र गई कोई पूछने वाला नहीं आया मेरी भी क्या ज़िंदगी है
आपको किसने पैसे भेजे काकी ? मैंने फिर पूछा
मेरे पति का बेटा होगा काकी व्यंग्य से बोली
काकी आप के पति का बेटा आपका ही बेटा हुआ न  मैंने आश्चर्य से पूछा
मेरा बेटा होता तो क्या मैं ऐसे दर-दर भटकती ‍! घर-बार-संसार पति पुत्र ये सब मेरे नसीब में नहीं है रे ...छोड न मेरी लंबी कहानी है कहते हुए आगे कहने लगी
मैं अपनी माँ के साथ रहती थी , मेरे बाबा नहीं थे माँ मुझसे बहुत प्यार करती थीं  मैं स्कूल जाती थी पर माँ ने 10 साल की उमर में मेरी पढाई छुडा दी वो मेरी शादी करा देना चाहती थी । 12 साल की उमर में मेरी शादी हैदराबाद में रहने वाले 22 साल के वकील से करवा दी गई । कुछ दिन बाद लेने आऊँगा कहा परंतु   वे मुझे लेने नहीं आए कोई न कोई बहाना बना कर आना टालते रहे इस तरह मैं विवाह के बाद भी माँ के घर ही रह गई । मगर मैं कुछ ना कह पाती बस घुटती रहती और एक एक साल गिन- गिन कर काटती जाने वो कब आए पर वो कभी नहीं आए ।
मेरे घर के  पडोस में राजू  नाम का एक लडका रहता था दिखने में अच्छा भला था और बातों में मजाकिया . . .  काकी रूक गई
आगे क्या हुआ काकी मैंने पूछा
गहरे कुँऐं से आती आवाज़ की भाँति काकी की आवाज़ आई –
मेरा यह हाल उसी के कारण हुआ। मैं बहुत सुंदर थी मेरे रूप को देख कर कई लोग जलते थे। राजू भी मुझ पर आसक्त था मैं उससे बात तो करती थी पर मैंने उसे कभी करीब आने नहीं दिया परंतु उसकी आसक्ति दिनों दिन बढती ही जा रही थी यह देख कर मैं उससे दूर रहने लगी ।
एक दिन माँ मंदिर गई थी और मैं कुँऐं पर कपडे धो रही थी । कपडे धो कर मैं अंदर जाने लगी तो सर्र की आवाज़ आई। पास से शायद एक साँप गुज़रा था मैं डर कर चकरा कर गिर गई आवाज़ सुनकर राजू दौड कर बाहर आया और मुझे उठा कर अंदर ले गया पानी पिलाया और मेरे सिर को सहलाता बैठा रहा माँ आई तो उठ कर चला गया ।
अचानक एक दिन पडोसन से माँ का झगडा हो गया। उन्होंने मेरे बारे  में बहुत अनाप-शनाप  कहा और इल्ज़ाम लगाते हुए चिठ्ठियाँ भी लिख डाली। राजू को भी बहुत अपमानित किया गया वह रोज-रोज की इस किच-किच से परेशान होकर गाँव छोड कर जाने कहाँ चला गया। मेरे पति को यही एक बहाना मिल गया कोर्ट में अर्जी डाल कर मुझसे अलग हो गए और फिर से शादी कर ली अब दो बेटे हैं मैं अकेली रह गई । मैं बंजर धरती की तरह सारी ज़िंदगी खाली पडी रही । मैं दुनिया की नज़रों में न सुहागिन बनी और न विधवा। मैं अंदर ही अंदर इस दौरान गुज़रे सारे हादसों को झेलती रही ।
इतना कह कर काकी ने लंबी सांस ली और अपनी पेटी खोल कर एक पुराना पत्र निकाला । पत्र काफी पुराना था हर मोड से फटने लगा था काकी को यह पत्र उनके पति ने बहुत ही डाँट कर लिखा था
आपने अभी तक यह पत्र क्यों संभाल कर रखा है काकी यह कोई प्रेम पत्र  तो नहीं है।
हाँ रे पर मेरे पति के द्वारा लिखा गया यह एकमात्र पत्र है इसीलिए संभाल कर रखा है । मेरी आँखें भर आयीं ।
छोड ना ये सब, मेरी चिंता मत कर, जा घर जाकर खाना खा कर सो जा कल कॉलेज भी जाना है ।
मैं भारी मन से काकी के घर से निकली। काकी की कहानी सुनकर मेरी समझ में आया कि काकी क्यों मुझे इतनी हिदायत देती हैं। सुबह की एक खबर भी दिमाग में कौंध गई कि बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए बना कानून । सच ही है बाल विवाह के कारण मेरी काकी और न जाने कितनी काकियों का जीवन इस तरह सूना हो गया होगा। इस प्रथा पर रोक लगनी ही चाहिये।
साथ ही गाँधीजी की कही बात याद आई कि भले ही नारी शारीरिक रूप से पुरुष से कमज़ोर हो पर वह हमेशा मानसिक रूप से पुरुष से बहुत अधिक बलवान है ।
अगली सुबह डाकिए ने आवाज़ दी कि काकी बुला रही है जाने क्या बात हो गई सोच कर काकी के पास गई तो काकी बाहर ही खडी थी। आज काकी बहुत ही शांत और खुश दिख रही थी ऐसा लग रहा था जैसे उनके सर से बहुत बडा भार उतर गया हो
क्या बात है काकी ?
देख गुडिया यह मनी ऑर्डर मुझे नहीं चाहिए । मुझे न अभी और न कभी पैसे चाहिए, मुझे किसी की करूणा नहीं चाहिए, मैं अपने बलबूते  पर खुश हूँ ,आईंदा कभी मनी ऑर्डर न भेजे तू उस पर ऐसा लिख दे , और लौटा दे । डाक वाले भाई तुम इसे वापस ले जाओ ।
काकी का यह निर्णय उनके झुर्रियों से भरे मुख पर और मिर्च कूटने वालो हाथों पर मुस्कुरा कर खेलने लगी मुझे अपनी कविता याद आ गई
मैंने तो नहीं देखा है
ज़िंदगी को
पर महसूस किया है
एक चेहरे पर
ज़िंदगी को
होंठो पर हंसी सदा
आँखों में जीने की अदा
जीने की लेकर श्रद्धा ' एक वृद्धा  मेरी काकी

स्वर्ण ज्योति

Tuesday, November 20, 2007

माटी का दिया

सांध्य रवि ने कहा
मेरे बाद होगा कौन?
रह गया सारा जग
सुनकर निरूत्तर मौन

एक नन्हें दिए ने
तब कहा कि " नाथ
जितना मुझसे हो सकेगा
मैं दूँगा साथ"

कि छोटा-सा हूँ मैं
माटी का एक दिया
खुद जलता हर पल
जग रोशन करता पल-पल

माना मुझमें है नहीं
सूरज की-सी रोशनी
मुझमें है नहीं
चँदा की-सी चाँदनी
पर मुझमें कोई दाग नहीं
और न लगे मुझें ग्रहण कभी

हो चाहे मेरे तले अँधेरा
पर रोशन हो हर बसेरा
कि मैं एक छोटा-सा
माटी का दिया


Friday, March 09, 2007

पानी

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

तेरा नहीं कोई रंग
पर निराले तेरे ढंग

तू जीवन की रस धार
तुझमें बसे सारा संसार

कभी बूँदें तो कभी बौछारें
कभी बरखा तो कभी बाढें

तेरे कितने ही नाम
पूजे हम तेरे धाम

कहीं तू माता तो कहीं सुता
कहीं तू पुत्र तो कहीं मित्र

तेरा विचित्र रूप सुनामी
बना गया जीवन को बेमानी

तेरी लीला अपरम्पार
तू लगाए भव सागर पार

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

यह कविता पाँडीचेरी में सुनामी से हुई
तबाही पर लिखी गई थी।

काग़ज़ और कलम

एक दिन जब मैंनें
कुछ शब्द लिखें
तत्क्षण काग़ज़ पर
कुछ आँसू देखे

हर्फ़ सब हुए थे तर
रंग हुआ था बदतर
हादसा था अज़ीब
कह रहा था काग़ज़
कलम से अपना नसीब

तुम मुझ पर क्यों हो फिरती
रंगरूप मेरा बिगाड हो देती
मुझे काले-नीले रंगों से
क्यिं हो भर देती
किसी के अस्तित्व को निखार
मुझे कलंकित हो कर देती

मैं नहीं मानती
तुम्हारा तर्क
तुम्हारी क्या कीमत
बिना हर्फ़
रहोगे कोरे तो
पडे रहोगे कोने में
मैंनें ही पहुँचाया है
तुमको कोने-कोने में

छोडो यूँ न करो तकरार
बढाओ न बात को बेकार
एक शाश्वत सत्य यह जान लो
तुम दोनों हो समान मान लो


यह कविता सृजन गाथा पत्रिका में भी छप चुकी है

Tuesday, February 27, 2007

खूनी सागर

आज दिन भर रहा
उसका साया
मेरे साथ फिरता रहा
बनकर छाया

ज्यों ही पल-पल
दिन गहराया
त्यों-त्यों मेरा मन
घबराया कि
वक्त ने वही क्षण
है दुहराया

आज फिर खून हो गया
गगन पुनः लाल हो गया

मैं दौडा, भागा भी
चीख कर था उसे
रोका भी पर
अफ़सोस सारे प्रयत्न
हुए विफल
आज सागर ने फिर
सूरज को था निगल


मैं स्तब्ध सा था खडा
आँखें हुई थी सजल

Saturday, February 17, 2007

माँडू
मेरे सामने एक तस्वीर है
माँडू का जहाज महल
पुण्य-पवित्र नर्मदा के तट पर
माँग रहा न्याय समय के दर पर

बाज़ बहादुर के दीवानगी का
रूपमती के रूप लावण्य का
सबूत
आज बन गया
ताबूत
माँडू का जहाज महल

इतिहास के पन्नों पर शाश्वत
हमारी संस्कृति का विरासत
गुमनामी के अँधेरों से होकर आहत
गूँजें आवाज़, करे खँडहरों से सवालात

नर्मदा के कलकल में वह स्वर नहीं
रानी का मन मोह लेती थी जो कभी
सिसक रही थी उसकी कलकल
अपनी ज़र्ज़र अवस्था के देख पल

पाकर रूखा-सूखा स्पर्श
आज वह भी हो गए हैं चुप
बन गए होकर विवश
कैलेंडर की एक तस्वीर
देख इसे ही शायद कोई
समझे उनकी पीर

Thursday, February 15, 2007

शिवरात्री के उपल्क्ष्य पर

जोगी

जोगी है आया तेरे द्वारे
जटाजूट भस्म विभूत हैं धारे

प्रिय दरसन की आस है पर
भवति भिक्षांह देहि पुकारे

नील अंग है मृग छाला वसन
भूत पिशाच का देव करे भजन

वृषभ पर सवारी है करे
ताज बना शीश पर भागीरथी धरे

कांधे सर्प गले मुण्डन माला
शशि रख कर दिखता है आला

भक्ति प्रेम का है मतवाला
पी जाए विष भी समझ हाला

भ्रमित होकर तकते दृग नयन
गोरी का मन कहे यही मेरा सजन
राह के दऱख्त

काश.....
राह पर खडे दऱख्त
कुछ बोल पाते
अपनी ज़बानी अपनी गवाही
दे पाते तो
कितने किस्से कह पाते
काश......
ये कुछ बोल पाते

पंथी को छाया
राही को साया
भूलों को राहें
भटकों को बाँहें
देकर भी ये हैं
कितने.... अकेले

हरियाली के मेले
हैं कितने अलबेले
छाँव में अपनी
नन्हें नीडों को पाले
पर हैं अकेले
तन्हाई का दुःख झेलें

काश.....
ये कुछ बोल पाते
तो अपनी व्यथा-कथा
अपनी दर्द बाँट पाते
काश....
राह के दऱख्त
कुछ बोल पातें.........

Sunday, February 11, 2007

नासमझ

मौन ही ग़र तेरी भाषा होती तो
मैं सब कुछ समझ लेता पर
तेरी तो निराली अदा निकली जो
चुप रहकर भी बोल निकली

कुछ कही-अनकही बातों से
कुछ बुझी-अनबुझी निगाहों से
तेरी दास्तां का इल्म न मुझे हो सका
फिर कैसे कहूं सब समझ सका

थर्राते लबों को इकरार समझूँ
या बहते अश्कों को इनकार
झुकी पलकों को समझूँ हया
या समझूँ सुर्ख गालों को बला

तेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
कैद होकर रह गया हूँ मैं
दिल मे मेरा गया है उलझ
कैसे समझाऊँ ओ नासमझ

Friday, February 09, 2007

कन्नड के प्रसिद्ध चलन चित्र नायक, परिवेशवादी, साहित्यकार श्री सुरेश हेब्बलिकर के द्वारा कृति विमोचन, साथ में कर्नाटक राज्य स्रकार में (सेवानिवॄत) मुख्य अरण्य अधिकारी तथा रचनाकार जो मेरे बडे बाबूजी भी हैं , श्री कृष्ण स्वामी जी , और मध्यप्रदेश में सिंचाई विभाग में मुख्य अभियंता (सेवानिवृत) मेरे बाबूजी श्री ए. नागराज राव और मैं
मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद तथा अखिल कर्नाटक हिन्दी साहित्य अकादमी के द्वारा आयोजित पुस्तक "अच्छा लगता है" का लोकार्पण समारोह
नवीं अखिल भारतीय कन्नड सम्मेलन में मेरी कृति "अच्छा लगता है" का विमोचन श्री रामे गौडा द्वारा साथ में कन्नड की प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती कमला हम्पना और उनके साथ प्रसिद्ध गायक श्री शिवमोगा सुब्बण्णा दूसरी ओर श्रीमान हम्पना और मैं स्वयं

Wednesday, February 07, 2007

आज की राजनीति पर एक व्यंग्य


नया कुरुक्षेत्र

खेल रहा है दाँव शकुनि -सा

साम-दाम-दंड-भेद अपना कर
भोग रहा है राज दुर्योधन-सा

सत्यमेव जयते हैं कुछ कहते
पर रखें ज़ुबां बंद विदुर-सा

हैं कई लक्ष्य निशाने पर
नहीं है तीरंदाज अर्जुन-सा

सौ करोड की सेना है पर
नहीं है सेनापति द्रोण-सा

है खडा तैयार प्रगति का रथ
नहीं है हाँकने को सारथी कृष्ण-सा

यही पूछे है जन-मन यक्ष प्रश्न
नहीं है उत्तर देने को धर्मपुत्र युधिष्ठर-सा

था वह युद्ध पाँडव और कौरव का
है यह युद्ध मानव से मानव का

बना था केवल अट्ठारह दिन का युद्ध्क्षेत्र

कैसी है ये राजनीति कैसा है ये राष्ट्र
कुछ बने हैं गांधारी कुछ हैं धॄतराष्ट्र

शतरंज बिछा कर हर कोई

आज तो बन गया है जीवन ही कुरुक्षेत्र

कैसी ये राजनीति कैसा ये राष्ट्र......?