achcha lagtha hai

Tuesday, November 20, 2007

माटी का दिया

सांध्य रवि ने कहा
मेरे बाद होगा कौन?
रह गया सारा जग
सुनकर निरूत्तर मौन

एक नन्हें दिए ने
तब कहा कि " नाथ
जितना मुझसे हो सकेगा
मैं दूँगा साथ"

कि छोटा-सा हूँ मैं
माटी का एक दिया
खुद जलता हर पल
जग रोशन करता पल-पल

माना मुझमें है नहीं
सूरज की-सी रोशनी
मुझमें है नहीं
चँदा की-सी चाँदनी
पर मुझमें कोई दाग नहीं
और न लगे मुझें ग्रहण कभी

हो चाहे मेरे तले अँधेरा
पर रोशन हो हर बसेरा
कि मैं एक छोटा-सा
माटी का दिया


Friday, March 09, 2007

पानी

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

तेरा नहीं कोई रंग
पर निराले तेरे ढंग

तू जीवन की रस धार
तुझमें बसे सारा संसार

कभी बूँदें तो कभी बौछारें
कभी बरखा तो कभी बाढें

तेरे कितने ही नाम
पूजे हम तेरे धाम

कहीं तू माता तो कहीं सुता
कहीं तू पुत्र तो कहीं मित्र

तेरा विचित्र रूप सुनामी
बना गया जीवन को बेमानी

तेरी लीला अपरम्पार
तू लगाए भव सागर पार

पानी रे पानी
तेरा नहीं कोई सानी

यह कविता पाँडीचेरी में सुनामी से हुई
तबाही पर लिखी गई थी।

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काग़ज़ और कलम

एक दिन जब मैंनें
कुछ शब्द लिखें
तत्क्षण काग़ज़ पर
कुछ आँसू देखे

हर्फ़ सब हुए थे तर
रंग हुआ था बदतर
हादसा था अज़ीब
कह रहा था काग़ज़
कलम से अपना नसीब

तुम मुझ पर क्यों हो फिरती
रंगरूप मेरा बिगाड हो देती
मुझे काले-नीले रंगों से
क्यिं हो भर देती
किसी के अस्तित्व को निखार
मुझे कलंकित हो कर देती

मैं नहीं मानती
तुम्हारा तर्क
तुम्हारी क्या कीमत
बिना हर्फ़
रहोगे कोरे तो
पडे रहोगे कोने में
मैंनें ही पहुँचाया है
तुमको कोने-कोने में

छोडो यूँ न करो तकरार
बढाओ न बात को बेकार
एक शाश्वत सत्य यह जान लो
तुम दोनों हो समान मान लो


यह कविता सृजन गाथा पत्रिका में भी छप चुकी है

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Tuesday, February 27, 2007

खूनी सागर

आज दिन भर रहा
उसका साया
मेरे साथ फिरता रहा
बनकर छाया

ज्यों ही पल-पल
दिन गहराया
त्यों-त्यों मेरा मन
घबराया कि
वक्त ने वही क्षण
है दुहराया

आज फिर खून हो गया
गगन पुनः लाल हो गया

मैं दौडा, भागा भी
चीख कर था उसे
रोका भी पर
अफ़सोस सारे प्रयत्न
हुए विफल
आज सागर ने फिर
सूरज को था निगल


मैं स्तब्ध सा था खडा
आँखें हुई थी सजल

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Saturday, February 17, 2007

माँडू
मेरे सामने एक तस्वीर है
माँडू का जहाज महल
पुण्य-पवित्र नर्मदा के तट पर
माँग रहा न्याय समय के दर पर

बाज़ बहादुर के दीवानगी का
रूपमती के रूप लावण्य का
सबूत
आज बन गया
ताबूत
माँडू का जहाज महल

इतिहास के पन्नों पर शाश्वत
हमारी संस्कृति का विरासत
गुमनामी के अँधेरों से होकर आहत
गूँजें आवाज़, करे खँडहरों से सवालात

नर्मदा के कलकल में वह स्वर नहीं
रानी का मन मोह लेती थी जो कभी
सिसक रही थी उसकी कलकल
अपनी ज़र्ज़र अवस्था के देख पल

पाकर रूखा-सूखा स्पर्श
आज वह भी हो गए हैं चुप
बन गए होकर विवश
कैलेंडर की एक तस्वीर
देख इसे ही शायद कोई
समझे उनकी पीर

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Thursday, February 15, 2007

शिवरात्री के उपल्क्ष्य पर

जोगी

जोगी है आया तेरे द्वारे
जटाजूट भस्म विभूत हैं धारे

प्रिय दरसन की आस है पर
भवति भिक्षांह देहि पुकारे

नील अंग है मृग छाला वसन
भूत पिशाच का देव करे भजन

वृषभ पर सवारी है करे
ताज बना शीश पर भागीरथी धरे

कांधे सर्प गले मुण्डन माला
शशि रख कर दिखता है आला

भक्ति प्रेम का है मतवाला
पी जाए विष भी समझ हाला

भ्रमित होकर तकते दृग नयन
गोरी का मन कहे यही मेरा सजन

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राह के दऱख्त

काश.....
राह पर खडे दऱख्त
कुछ बोल पाते
अपनी ज़बानी अपनी गवाही
दे पाते तो
कितने किस्से कह पाते
काश......
ये कुछ बोल पाते

पंथी को छाया
राही को साया
भूलों को राहें
भटकों को बाँहें
देकर भी ये हैं
कितने.... अकेले

हरियाली के मेले
हैं कितने अलबेले
छाँव में अपनी
नन्हें नीडों को पाले
पर हैं अकेले
तन्हाई का दुःख झेलें

काश.....
ये कुछ बोल पाते
तो अपनी व्यथा-कथा
अपनी दर्द बाँट पाते
काश....
राह के दऱख्त
कुछ बोल पातें.........

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Sunday, February 11, 2007

नासमझ

मौन ही ग़र तेरी भाषा होती तो
मैं सब कुछ समझ लेता पर
तेरी तो निराली अदा निकली जो
चुप रहकर भी बोल निकली

कुछ कही-अनकही बातों से
कुछ बुझी-अनबुझी निगाहों से
तेरी दास्तां का इल्म न मुझे हो सका
फिर कैसे कहूं सब समझ सका

थर्राते लबों को इकरार समझूँ
या बहते अश्कों को इनकार
झुकी पलकों को समझूँ हया
या समझूँ सुर्ख गालों को बला

तेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
कैद होकर रह गया हूँ मैं
दिल मे मेरा गया है उलझ
कैसे समझाऊँ ओ नासमझ

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Friday, February 09, 2007

कन्नड के प्रसिद्ध चलन चित्र नायक, परिवेशवादी, साहित्यकार श्री सुरेश हेब्बलिकर के द्वारा कृति विमोचन, साथ में कर्नाटक राज्य स्रकार में (सेवानिवॄत) मुख्य अरण्य अधिकारी तथा रचनाकार जो मेरे बडे बाबूजी भी हैं , श्री कृष्ण स्वामी जी , और मध्यप्रदेश में सिंचाई विभाग में मुख्य अभियंता (सेवानिवृत) मेरे बाबूजी श्री ए. नागराज राव और मैं

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मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद तथा अखिल कर्नाटक हिन्दी साहित्य अकादमी के द्वारा आयोजित पुस्तक "अच्छा लगता है" का लोकार्पण समारोह

नवीं अखिल भारतीय कन्नड सम्मेलन में मेरी कृति "अच्छा लगता है" का विमोचन श्री रामे गौडा द्वारा साथ में कन्नड की प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती कमला हम्पना और उनके साथ प्रसिद्ध गायक श्री शिवमोगा सुब्बण्णा दूसरी ओर श्रीमान हम्पना और मैं स्वयं

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Wednesday, February 07, 2007

आज की राजनीति पर एक व्यंग्य


नया कुरुक्षेत्र

खेल रहा है दाँव शकुनि -सा

साम-दाम-दंड-भेद अपना कर
भोग रहा है राज दुर्योधन-सा

सत्यमेव जयते हैं कुछ कहते
पर रखें ज़ुबां बंद विदुर-सा

हैं कई लक्ष्य निशाने पर
नहीं है तीरंदाज अर्जुन-सा

सौ करोड की सेना है पर
नहीं है सेनापति द्रोण-सा

है खडा तैयार प्रगति का रथ
नहीं है हाँकने को सारथी कृष्ण-सा

यही पूछे है जन-मन यक्ष प्रश्न
नहीं है उत्तर देने को धर्मपुत्र युधिष्ठर-सा

था वह युद्ध पाँडव और कौरव का
है यह युद्ध मानव से मानव का

बना था केवल अट्ठारह दिन का युद्ध्क्षेत्र

कैसी है ये राजनीति कैसा है ये राष्ट्र
कुछ बने हैं गांधारी कुछ हैं धॄतराष्ट्र

शतरंज बिछा कर हर कोई

आज तो बन गया है जीवन ही कुरुक्षेत्र

कैसी ये राजनीति कैसा ये राष्ट्र......?

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Monday, January 29, 2007

आज के युवा वर्ग पर लिखी है यह कविता अनेक आशाएँ लेकर शिक्षा पूरी करना और फिर यूँही भटकना और शायद इस भटकाव से ही किसी गलत राह पर चलने की मजबूरी को पालना

युवा

एक अधखुला झरोखा
दो प्यासे नयन झाँकते
इधर-उधर आते जाते
लोगो को उत्सुकता से ताकते

अस्तित्व-अस्मिता की लेकर आस
ढूँढें हैं गली-गली ब्रह्म में रख विश्वास
सत्य और यथार्थ का एहसास
जलाता है आशाओं को जैसे जले कपास

दिल की आग पर उबलता है
चढती-ढलती सांसों का पानी
शोला बनकर है भडकता
बैचेन मजबूर जवानी

राख के नीचे चिनगारियों का
आग बनने का है सबब
छोड नीति-रीति और तहज़ीब
गर्म खून में आई रवानी

हाय रे जवानी

सुरमई बनी सिन्दूरी शाम
समय का पहिया घूमा दूसरे धाम
जिन्दगी ने नहीं दिया कोई नाम
अब भी यह वही इंतजार का काम

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Wednesday, January 10, 2007

विश्व का एकमात्र काव्य

इस दुनिया मे अनगिनत भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती है, समझी जाती है, लिखी और पढी जाती हैं। इतिहास साक्षी है कि कई मतभेदों का कारण भाषावाद रहा है। जिस समाज में जातिवाद का प्रचलन हो उस समाज में भाषावाद स्वयंमेव ही जन्म ले लेता है।
आदि मानव के लिए अंगीकाभिनय ही भावाभिव्यक्ति का साधन था । इस व्यवस्था ने आगे चलकर चित्राभिव्यक्ति का रूप धारण कर लिया यह चित्राभिव्यक्ति कोई श्रेष्ठ चित्रकला का प्र्तीक नहीं थी । मानव के द्वारा बोली का अविष्कार करने के कई वर्षों के बाद लिपि का अविष्कार हुआ । लिपि के साथ संख्या भी अवतरित हुई । मानव जब अपने भावों, अनुभावों और अनुभवों को अक्षरों मे उतारने लगा तब साहित्य कानिर्माण हुआ इसे अक्षर लिपि काव्य कहा जाता है । इसी प्रकार स्पंदित होकर भावों -अनुभावों को भाषा की तरह ही समर्थ रूप से प्रकट करने के लिए संख्या रूपी संकेतों का जन्म हुआ इनके द्वारा रचित रचना को संख्या लिपि काव्य कह सकते हैं ।
इस रीति से उपलब्ध संख्या लिपि एकैक आश्चर्य जनक काव्य श्री कुमदेन्दु विरचित
सिरि भूवलय है
सिरि भूवलय विश्व के आश्चर्यों में से एक है ऐसी घोषणा करने में आगे-पीछे सोचने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह एक अपूर्व, अन्यादृश, विशिष्ट , संख्या धारित, सांकेतिक धार्मिक काव्य, जैन धार्मिक काव्य, कन्नड अंक लिपि में लिपि बध्द लेकिन विश्व के ७१८ भाषाओं को अपने गर्भ में रख अपने महोन्नति से विश्व के भाषा साहित्य के लिए एक प्रश्न बन कर खडा, विचित्र और विशिष्ट कला कॄति है । इसी कारण श्री कुमदेन्दु इसे सर्व भाषा मयी कर्नाटक काव्य और विश्व काव्य कहकर संबोधित करते हैं ।
आदि तीर्थंकर होने वाले पुरदेव तीसरे परिनिष्क्रमण कल्याण के बाद वैराग्य परावश होकर समस्त साम्राज्य को अपने पुत्रों में बाँट देते हैं । मुख्य रूप से भरत को "षट्टखंड मंडल" और बाहुबली स्वामी को "पौदनपुरादि महाभाग " प्राप्त होता है । शेष पुत्रों को शेष भूभाग में बँटवारा होता है। उस समय आदि देव की दो पुत्रियाँ कुछ शाश्वत संपत्ति देने का आग्र्ह पिता से करती हैं । तब आदि नाथ वॄषभ स्वामी ज्येषठ पुत्री ब्राह्मी को अप्ने बाँयी तथा छॊटी पुत्री सौन्दरी को अपने दाँयीं गोदी में बिठा कर ब्राह्मी के बाँयें हाथ पर अपने दाँएँ हाथ के अँगूठे से ॐ लिखते हैं । उसमें ६४ अक्षरों के वर्णमाला का सृजन कर " यह तुम्हारे नाम में अक्षर हो" और "समस्त भाषाओं के लिए इतने ही अक्शर पर्याप्त हो" कह कर आशीर्वाद देते हैं । ब्राह्मी से अक्षर लिपि को ब्राह्मी लिपि का नाम पडा । उनके द्वारा ब्राह्मी को " साहित्य शारदे" नाम की शाश्वत संपत्ति प्राप्त हुई ।
वृषभस्वामी अपनी दाँयी गोदी पर बैठी सौन्दरी के दाहिने हथेली पर अपने बाँएँ हाथ के अँगूठे से उसकी हथेली के मध्य भाग पर शून्य लिख कर इस शून्य को मध्य भाग में काटे तो ऊपर का भाग (टोपी के आकार का) और नीचे के भाग को अर्थ पूर्ण ढंग से मिलाते जाए तो ९ अंकों की सृष्टि होगी । इस तरह शून्य से ही विश्व की और गणित में अंकों की सृष्टि को दिखा कर सौन्दरी को गणित अथवा संख्या शास्त्र विशारदे नाम की शाश्वत संपत्ती देते हैं ।
इस प्रकार सौन्दरी के अंक ही अक्शरों के और ब्राह्मी के अक्षर ही अंकों के बराबर होंगें ऐसा स्पष्ट कर दोनों पुत्रियों को दी गई शाश्वत संपत्तो एक ही वज़न की है , कह अंकाक्षर लिपि में भी काव्य रचना की साध्यता का विवरण करते हैं ।
इसी को आधार बना कर मुनि कुमदेन्दु ने अपने सिरि भूवलय काव्य की रचना की जिसमें वे ६४ ध्वनियों का संकेत देते हैं जिसमें हर्स्व, दीर्घ और प्लुतों से मिलकर २७ स्वर, क,च,त,प, जैसे २५ वर्गीय वर्ण य,र,ल,व, अवर्गीय व्यंजन बिन्दु अथवा अनुस्वार (०) विसर्ग अथवा विसर्जनीय (ः) जिह्वा मूलीय (ஃ) (यह तमिल में प्रयोग होता है जो हिन्दी के बिन्दु का प्रतीक है ) उपध्मानीय (ःः) नाम के चार योगवाह सभी मिलाकर ६४ मूलाक्शरों को १ से लेकर ६४ संख्याओं का संकेत देते हैं । यह क्रम रूप से २७गुणा २७ =७२९ बनते हैं । कवि के निर्देशानुसार ऊपर से नीचे , नीचे से ऊपर अंकों की राह पकड कर चले तो भाषा की छंदोबध्द काव्य अथवा एक धर्म, दर्शन, कला, विञान बोधक शास्त्र कृति लगती है ।
यह केवल एक ही कन्नड भाषां प्रतिनिधित्व अंकों में ही होने पर भी विश्व की अनेक भाषाओं, अनेक काव्य शास्त्रों , धर्म, राजनीति, मनोविञान, ज्योतिष्य आदि को समाहित किए हुए है सभी को एक अर्थपूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने वाली विश्व विनूतन आश्चर्यकर रचना होने के कारण इसे अंकाक्षर विञान रूपी विश्व कोष भी कह सकते हैं।

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Wednesday, January 03, 2007

इस कविता को एक तस्वीर देख कर लिखि थी जिसमें बर्फ़ से ढकी हिमालय की चोटी और नीचे हरी दूब
कुछ ऐसा ख्याल मन में आया

हिमखंड

ऐ हिमखंड !
तू कर न घमंड

तू दिखे
श्वेत,स्वच्छ, निर्मल
रूई के फ़ाहे-सा कोमल
तू चमके आईने-सा उज्जवल
तू खूबसूरत जैसे चांदनी
तुझमें गई है घुल

पर तुझको यह नहीं एहसास
कि तू भोग रहा है मृत्यु दंड

ऐसे न तू कर हठ
जरा झुक नीचे तो देख
लिखा है हरी दूब ने लेख
तुझ से है जो श्रेष्ठ

कोई सहला तो कोई निहार
है उसको जाता
कोई भोजन, कोई पूजन
के लिए ले जाता
छोडकर अपना धाम
आती दूजे के काम

तेरी है क्या बिसात
कि तू न छोडे अपनी औकात
तू क्या जाने जीवन की बात
कि तू कब रहा जीवन के साथ

तू न पिघले न झुके
न करे धरती स्पर्श

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Tuesday, December 26, 2006

अलकों का छल्ला

स्वर्ण विहीन तर्जनी तुम्हारी
बहुत सुन्दर है लगती

दाने चावल के जब चुनती
आँखें कोहीनूर सी चमकती
राह प्रिय की हैं तकती

श्रंगार रहित चेहरा
नाक में लौंंग है पहना
लंबी सुराहीदार गरदन
काला तिल ही है गहना

कंकड जब उछालती
चूडी छन से खनकती
कहीं का कहीं गिर कंकड
आवाज़ ख्न से गूँजाता
आहट प्रिय की जान
मासूम मन है चौंकता

अनगिनत काजों को नकारती
दीवार पर जडी तस्वीर की तरह
दहलीज़ पर बैठी मुस्काती
चेहरे पर अलकों को
खोलती, लपेटती, खेलती
उँगली में छल्ला बना पहनती

स्वर्ण विहीन तर्जनी तुम्हारी
बहुत सुन्दर है लगती

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Friday, November 17, 2006

यूँ तो यह कविता एक-बारगी पढने पर साधारण सी प्रेम कविता लगती है परन्तु यह कविता कबीर के राम के लिए निर्गुण भाव को दर्शाती हुई जैसी प्रेम कविता है सच ही है हम अपने राम को कहाँ किस रूप में रख पायेंगें

तेरा अक्स

मैंने तुमको कैसे-कैसे अक्स करना चाहा.....

आँखों में काजल बनाकर रखना चाहा
पर तुम बह गए अश्रु बन कर

होंठों पर मुस्कान बना कर रखना चाहा
पर तुम घुल गए मोम बन कर

गालों में लाली बना कर रखना चाहा
पर तुम उड गए कपूर बन कर

बालों में कली का गजरा बनाकर रखना चाहा
पर तुम मुरझा गए फूल बन कर

हाथों में कँगन बना कर रखना चाहा
पर तुम टूट गए सपना बन कर

पर तुम्हें किसी अक्स की क्या ज़रूरत....

तुम तो महकते हो सांसों में खुशबू बन कर
धडकते हो दिल में धडकन बन कर
गूँजते हो कानों में सरगम बन कर
बहते हो मन में मधु बन कर ।

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यह कविता कुछ २५ सालों पहले लिखी थी पर आज भी लगता है कि यह बात उतनी ही सच है जितनी उस समय थी

ख़ूने जिग़र

एक खूबसूरत शाम ढले
कोरे काग़ज़ का टुकडा
दिया था किसी को
"लिख दो" कुछ कह कर कि
जाने अब हम कब मिले.....?

पाया मैंने ऐसा उत्तर....

लिख न पायेंगे कुछ
कैसे कह दें
नहीं आता लिखना कुछ
क्या ऐसा लिख दे

मैं हँस पडी........

दी है उसी ने दुआ
लाल स्याही से
जैसे लिखा हो
ख़ूने जिग़र से

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Wednesday, November 15, 2006

हम सभी ने उडते हुए बादलों को देखा है। कई आकार-प्रकार के रूप में देखा है। उन बादलों को देख कर आप के मन में क्या ख्याल आया होगा यह तो मैं नहीं जानती पर मेरे मन में उन बादलों से बात करने की चाह हुई मैं बात भी की जवाब क्या मिला जानते हैं-----जवाब तो मिला पर मैंने बातों ही बातों में उसे चुनौती भी दे दी कैसे ---कुछ ऐसे--

खामोश चुनौती

मैंने बादल से कहा
तुम पर एक कविता
लिखना चाहता हूँ

बादल हँसा..... व्यंग्य से
पूछा उसने.....
क्या तुम्हारी कविता
है मुझ सी रंगी....?
मैंने कहा.....नहीं

क्या तुम्हारी कविता
चंचल, चपल, शांत और
है गंभीर....?
मैंने कहा....... नहीं

धरती आकाश में समाहित
ऐसा मेरा सारा व्यक्तित्व
सॄष्टि के नियम के संग-संग
रचा मेरा अस्तित्व

क्या तुम्हारी कविता
सुंदर मोहक शीतलता
से है शोभिता
मैंने कहा ..... नहीं पता

बादल बोला
जब जीवन के रंग ही न हो
तो कविता क्या
ख़ाक लिखोगे.....?
मैं निरूत्तर
मौन हो गया ।

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Tuesday, November 07, 2006

कविताएँ लिखना मुझे नहीं आता है क्योंकि मैंने कभी भी लिखने के लिए नहीं लिखा बस कभी कोई ख्याल मन में आया, कभी कोई दर्द दिल को तडपा गया, कभी कोई खुशी तन को महका गई तो कभी कोई सपना देख लिया, सारे ख्याल, सारे दर्द , सारी खुशियाँ और सारे सपनों को कलम के जरिए कागज़ को कह दिया अब कहने से ही तो दिल ्हल्का होता है न ।
हम सभी बहुत सारे सपने देखते हैं कभी -कभी दिन में जागती आँखों से भी सपने देखते हैंं
मैंने भी कुछ सपने देखे हैंं आप को मेरे सपनों के विषय में बताती हूँ देखिए हँसिएगा नहीं

कैसा होगा

कभी-कभी इस दिल ने ऐसा भी सोचा है,
तरन्नुमों* से खामोशी* तक,
इस राह से उस मँजिल तक,
बस फ़ूल ही फ़ूल हो तो कैसा होगा....?

कभी-कभी इस दिल ने ऐसा भी सोचा है,
सूरज की रोशनी से चँदा की चाँदनी तक ,
एक ऊषा से एक निशा तक ,
इतना फ़ासला ही न हो तो कैसा होगा...?

कभी-कभी इस दिल ने ऐसा भी सोचा है,
आसमां और धरती का मिलन ,
क्षितिज की इस कल्पना का,
सत्य में साकार हो तो कैसा होगा....?

कभी-कभी इस दिल ने ऐसा भी सोचा है,
सपने तो सपने हैं सपनों की हक़ीक़त क्या?
पर सपने भी सच्चे हो ं तो कैसा होगा......?

*जन्म
*मृत्यु

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सभी मित्रों को नमस्कार
मैं स्वर्ण ज्योति पाँडीचेरी से आप सब का मेरे इस ब्लोग में आमंत्रित कर स्वागत करती हूँ
वैसे तो मेरी मातृ भाषा कन्नड है और यहाँ की स्थानीय भाशा तमिल
परन्तु मैं हिन्दी में रचनायें लिखती हूँ । वास्तव मे मेरे लिए हिन्दी ही मेरी सखि सहेली और संबंधी भी है
२५ साल पहले जब मैं यहाँ आई थी तब मुझे तमिल नहीं आती थी और कन्नड के कोई भी दोस्त मुझे नहीं मिले तब मेरी सखि बन कर हिन्दी ने ही मुझे अकेलेपन से उबारा था रचनायें तो मैं सालों से करती थी परन्तु यहाँ आकर मेरी रचनाओं में निखार आया क्योंकि अकेलेपन में मैंने हिन्दी को ही दोस्त बना कर हिन्दी से ही बातें की। आज मेरी एक कविताओं की किताब "अच्छा लगता है" छप चुकी है। अभी मैंने एक तमिल काव्य संग्रह का हिन्दी में अनुवाद किया है और एक जैन ग्रंथ का जो कि कन्नड में है अनुवाद कर रही हूँ । आज इंटरनेट के माध्यम से मैं आप सब को यह बातें बता रही हूँ जबकि मेरी रचनायें २५ साल पुरानी हैं आज आप सब तक पहुँचाने के लिए यह जरिया मिला है वरना यहाँ तो हिन्दी कोई पढता ही नहीं है, बावजूद इसके मैंने हिन्दी में काम करना नहीं छोडा । अब आप से गुजारिश है कि मेरी रचनाओं को पढ कर मुझे प्रतिक्रिया भेजें । इस ब्लोग में आप मैं मेरी कविताओं के साथ-साथ कहानी और लेख भी पढ सकते हैं । आशा करती हूँ कि आप सब का सहयोग मुझे प्राप्त होगा ।
धन्यवाद सहित
स्वर्ण ज्योति

Thursday, October 19, 2006

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