यह कविता कुछ २५ सालों पहले लिखी थी पर आज भी लगता है कि यह बात उतनी ही सच है जितनी उस समय थी
ख़ूने जिग़र
एक खूबसूरत शाम ढले
कोरे काग़ज़ का टुकडा
दिया था किसी को
"लिख दो" कुछ कह कर कि
जाने अब हम कब मिले.....?
पाया मैंने ऐसा उत्तर....
लिख न पायेंगे कुछ
कैसे कह दें
नहीं आता लिखना कुछ
क्या ऐसा लिख दे
मैं हँस पडी........
दी है उसी ने दुआ
लाल स्याही से
जैसे लिखा हो
ख़ूने जिग़र से
Labels: खूने ज़िगर

1 Comments:
लिख न पायेंगे कुछ
कैसे कह दें
नहीं आता लिखना कुछ
क्या ऐसा लिख दे
क्या शब्द-संगम है? लाजवाब!!!
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